Chapter
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61
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2
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34
|
---|---|---|---|---|
6 | 2 | 17 | 1 |
همی بنگرید این بدان آن بدین
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6 | 2 | 17 | 2 |
ز کردار بیداد شاه زمین
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6 | 2 | 18 | 1 |
از آن دو یکی را بپرداختند
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6 | 2 | 18 | 2 |
جز این چارهای نیز نشناختند
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6 | 2 | 19 | 1 |
برون کرد مغز سر گوسفند
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6 | 2 | 19 | 2 |
بیامیخت با مغز آن ارجمند
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6 | 2 | 20 | 1 |
یکی را به جان داد زنهار و گفت
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6 | 2 | 20 | 2 |
نگر تا بیاری سر اندر نهفت
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6 | 2 | 21 | 1 |
نگر تا نباشی به آباد شهر
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6 | 2 | 21 | 2 |
تو را از جهان دشت و کوه است بهر
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6 | 2 | 22 | 1 |
به جای سرش زان سری بیبها
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6 | 2 | 22 | 2 |
خورش ساختند از پی اژدها
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6 | 2 | 23 | 1 |
از این گونه هر ماهیان سیجوان
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6 | 2 | 23 | 2 |
از ایشان همی یافتندی روان
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6 | 2 | 24 | 1 |
چو گرد آمدی مرد از ایشان دویست
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6 | 2 | 24 | 2 |
بر آن سان که نشناختندی که کیست
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6 | 2 | 25 | 1 |
خورشگر بدیشان بزی چند و میش
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6 | 2 | 25 | 2 |
سپردی و صحرا نهادند پیش
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6 | 2 | 26 | 1 |
کنون کُرد از آن تخمه دارد نژاد
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6 | 2 | 26 | 2 |
که ز آباد ناید به دل برش یاد
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6 | 2 | 27 | 1 |
پس آیین ضحاک وارونه خوی
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6 | 2 | 27 | 2 |
چنان بد که چون میبدش آرزوی
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6 | 2 | 28 | 1 |
ز مردان جنگی یکی خواستی
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6 | 2 | 28 | 2 |
بکشتی چو با دیو برخاستی
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6 | 2 | 29 | 1 |
کجا نامور دختری خوبروی
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6 | 2 | 29 | 2 |
به پرده درون بود بیگفتگوی
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6 | 2 | 30 | 1 |
پرستنده کردیش بر پیش خویش
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6 | 2 | 30 | 2 |
نه بر رسم دین و نه بر رسم کیش
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6 | 3 | 1 | 1 |
چو از روزگارش چهل سال ماند
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6 | 3 | 1 | 2 |
نگر تا به سر برش یزدان چه راند
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6 | 3 | 2 | 1 |
در ایوان شاهی شبی دیر یاز
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6 | 3 | 2 | 2 |
به خواب اندرون بود با ارنواز
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6 | 3 | 3 | 1 |
چنان دید کز کاخ شاهنشهان
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6 | 3 | 3 | 2 |
سه جنگی پدید آمدی ناگهان
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6 | 3 | 4 | 1 |
دو مهتر یکی کهتر اندر میان
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6 | 3 | 4 | 2 |
به بالای سرو و به فرّ کیان
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6 | 3 | 5 | 1 |
کمر بستن و رفتن شاهوار
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6 | 3 | 5 | 2 |
به چنگ اندرون گرزهٔ گاوسار
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6 | 3 | 6 | 1 |
دمان پیش ضحاک رفتی به جنگ
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6 | 3 | 6 | 2 |
نهادی به گردن برش پالهنگ
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6 | 3 | 7 | 1 |
همی تاختی تا دماوند کوه
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6 | 3 | 7 | 2 |
کشان و دوان از پس اندر گروه
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6 | 3 | 8 | 1 |
بپیچید ضحاک بیدادگر
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6 | 3 | 8 | 2 |
بدرّیدش از هول گفتی جگر
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6 | 3 | 9 | 1 |
یکی بانگ بر زد به خواب اندرون
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6 | 3 | 9 | 2 |
که لرزان شد آن خانهٔ صدستون
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6 | 3 | 10 | 1 |
بجَستند خورشید رویان ز جای
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6 | 3 | 10 | 2 |
از آن غلغل نامور کدخدای
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6 | 3 | 11 | 1 |
چنین گفت ضحاک را ارنواز
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6 | 3 | 11 | 2 |
که شاها چه بودت نگویی به راز
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6 | 3 | 12 | 1 |
که خفته به آرام در خان خویش
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6 | 3 | 12 | 2 |
بر این سان بترسیدی از جان خویش
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6 | 3 | 13 | 1 |
زمین هفت کشور به فرمان تو است
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6 | 3 | 13 | 2 |
دد و دام و مردم به پیمان تو است
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6 | 3 | 14 | 1 |
به خورشید رویان جهاندار گفت
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6 | 3 | 14 | 2 |
که چونین شگفتی بشاید نهفت
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6 | 3 | 15 | 1 |
که گر از من این داستان بشنوید
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6 | 3 | 15 | 2 |
شودتان دل از جان من ناامید
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6 | 3 | 16 | 1 |
به شاه گرانمایه گفت ارنواز
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6 | 3 | 16 | 2 |
که بر ما بباید گشادنت راز
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6 | 3 | 17 | 1 |
توانیم کردن مگر چارهای
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6 | 3 | 17 | 2 |
که بیچارهای نیست پتیارهای
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6 | 3 | 18 | 1 |
سپهبد گشاد آن نهان از نهفت
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6 | 3 | 18 | 2 |
همه خواب یک یک بدیشان بگفت
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6 | 3 | 19 | 1 |
چنین گفت با نامور ماهروی
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6 | 3 | 19 | 2 |
که مگذار این را ره چاره جوی
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6 | 3 | 20 | 1 |
نگین زمانه سر تخت تو است
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6 | 3 | 20 | 2 |
جهان روشن از نامور بخت تو است
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6 | 3 | 21 | 1 |
تو داری جهان زیر انگشتری
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6 | 3 | 21 | 2 |
دد و مردم و مرغ و دیو و پری
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6 | 3 | 22 | 1 |
ز هر کشوری گِرد کن مهتران
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6 | 3 | 22 | 2 |
از اخترشناسان و افسونگران
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6 | 3 | 23 | 1 |
سخن سربهسر موبدان را بگوی
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6 | 3 | 23 | 2 |
پژوهش کن و راستی بازجوی
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6 | 3 | 24 | 1 |
نگه کن که هوش تو بر دست کیست
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6 | 3 | 24 | 2 |
ز مردم شمار ار ز دیو و پریست
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6 | 3 | 25 | 1 |
چو دانسته شد چاره ساز آن زمان
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6 | 3 | 25 | 2 |
به خیره مترس از بد بدگمان
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6 | 3 | 26 | 1 |
شه پر منش را خوش آمد سخن
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6 | 3 | 26 | 2 |
که آن سرو سیمین برافگند بن
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6 | 3 | 27 | 1 |
جهان از شب تیره چون پرّ زاغ
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6 | 3 | 27 | 2 |
همانگه سر از کوه بر زد چراغ
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6 | 3 | 28 | 1 |
تو گفتی که بر گنبد لاژورد
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6 | 3 | 28 | 2 |
بگسترد خورشید یاقوت زرد
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6 | 3 | 29 | 1 |
سپهبد به هر جا که بد موبدی
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6 | 3 | 29 | 2 |
سخن دان و بیداردل بخردی
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6 | 3 | 30 | 1 |
ز کشور به نزدیک خویش آورید
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6 | 3 | 30 | 2 |
بگفت آن جگر خسته خوابی که دید
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6 | 3 | 31 | 1 |
نهانی سخن کردشان آشکار
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6 | 3 | 31 | 2 |
ز نیک و بد و گردش روزگار
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6 | 3 | 32 | 1 |
که بر من زمانه کی آید بسر
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6 | 3 | 32 | 2 |
که را باشد این تاج و تخت و کمر
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6 | 3 | 33 | 1 |
گر این راز با من بباید گشاد
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6 | 3 | 33 | 2 |
و گر سر به خواری بباید نهاد
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6 | 3 | 34 | 1 |
لب موبدان خشک و رخساره تر
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6 | 3 | 34 | 2 |
زبان پر ز گفتار با یکدگر
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6 | 3 | 35 | 1 |
که گر بودنی باز گوییم راست
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6 | 3 | 35 | 2 |
به جانست پیکار و جان بیبهاست
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6 | 3 | 36 | 1 |
و گر نشنود بودنیها درست
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6 | 3 | 36 | 2 |
بباید هم اکنون ز جان دست شست
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