Chapter
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61
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76
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890
| Mesra
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2
| Text
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34
|
---|---|---|---|---|
5 | 1 | 20 | 1 |
بدان تا پرستش بود کارشان
|
5 | 1 | 20 | 2 |
نوان پیش روشن جهاندارشان
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5 | 1 | 21 | 1 |
صفی بر دگر دست بنشاندند
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5 | 1 | 21 | 2 |
همی نام نیساریان خواندند
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5 | 1 | 22 | 1 |
کجا شیر مردان جنگ آورند
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5 | 1 | 22 | 2 |
فروزندهٔ لشکر و کشورند
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5 | 1 | 23 | 1 |
کز ایشان بود تخت شاهی به جای
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5 | 1 | 23 | 2 |
و ز ایشان بود نام مردی به پای
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5 | 1 | 24 | 1 |
بسودی سه دیگر گره را شناس
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5 | 1 | 24 | 2 |
کجا نیست از کس بر ایشان سپاس
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5 | 1 | 25 | 1 |
بکارند و ورزند و خود بدروند
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5 | 1 | 25 | 2 |
به گاه خورش سرزنش نشنوند
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5 | 1 | 26 | 1 |
ز فرمان تنآزاده و ژندهپوش
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5 | 1 | 26 | 2 |
ز آواز پیغاره آسوده گوش
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5 | 1 | 27 | 1 |
تن آزاد و آباد گیتی بر اوی
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5 | 1 | 27 | 2 |
بر آسوده از داور و گفتگوی
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5 | 1 | 28 | 1 |
چه گفت آن سخنگوی آزاده مرد
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5 | 1 | 28 | 2 |
که آزاده را کاهلی بنده کرد
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5 | 1 | 29 | 1 |
چهارم که خوانند اهتو خوشی
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5 | 1 | 29 | 2 |
همان دستورزان ابا سرکشی
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5 | 1 | 30 | 1 |
کجا کارشان همگنان پیشه بود
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5 | 1 | 30 | 2 |
روانشان همیشه پر اندیشه بود
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5 | 1 | 31 | 1 |
بدین اندرون سال پنجاه نیز
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5 | 1 | 31 | 2 |
بخورد و بورزید و بخشید چیز
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5 | 1 | 32 | 1 |
از این هر یکی را یکی پایگاه
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5 | 1 | 32 | 2 |
سزاوار بگزید و بنمود راه
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5 | 1 | 33 | 1 |
که تا هر کس اندازهٔ خویش را
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5 | 1 | 33 | 2 |
ببیند بداند کم و بیش را
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5 | 1 | 34 | 1 |
بفرمود پس دیو ناپاک را
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5 | 1 | 34 | 2 |
به آب اندر آمیختن خاک را
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5 | 1 | 35 | 1 |
هر آنچ از گل آمد چو بشناختند
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5 | 1 | 35 | 2 |
سبک خشت را کالبد ساختند
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5 | 1 | 36 | 1 |
به سنگ و به گچ دیو دیوار کرد
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5 | 1 | 36 | 2 |
نخست از برش هندسی کار کرد
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5 | 1 | 37 | 1 |
چو گرمابه و کاخهای بلند
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5 | 1 | 37 | 2 |
چو ایوان که باشد پناه از گزند
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5 | 1 | 38 | 1 |
ز خارا گهر جست یک روزگار
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5 | 1 | 38 | 2 |
همی کرد از او روشنی خواستار
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5 | 1 | 39 | 1 |
به چنگ آمدش چند گونه گهر
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5 | 1 | 39 | 2 |
چو یاقوت و بیجاده و سیم و زر
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5 | 1 | 40 | 1 |
ز خارا به افسون برون آورید
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5 | 1 | 40 | 2 |
شد آراسته بندها را کلید
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5 | 1 | 41 | 1 |
دگر بویهای خوش آورد باز
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5 | 1 | 41 | 2 |
که دارند مردم به بویش نیاز
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5 | 1 | 42 | 1 |
چو بان و چو کافور و چون مشک ناب
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5 | 1 | 42 | 2 |
چو عود و چو عنبر چو روشن گلاب
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5 | 1 | 43 | 1 |
پزشکی و درمان هر دردمند
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5 | 1 | 43 | 2 |
در تندرستی و راه گزند
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5 | 1 | 44 | 1 |
همان رازها کرد نیز آشکار
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5 | 1 | 44 | 2 |
جهان را نیامد چون او خواستار
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5 | 1 | 45 | 1 |
گذر کرد از آن پس به کشتی بر آب
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5 | 1 | 45 | 2 |
ز کشور به کشور گرفتی شتاب
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5 | 1 | 46 | 1 |
چنین سال پنجه برنجید نیز
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5 | 1 | 46 | 2 |
ندید از هنر بر خرد بسته چیز
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5 | 1 | 47 | 1 |
همه کردنیها چو آمد به جای
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5 | 1 | 47 | 2 |
ز جای مهی برتر آورد پای
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5 | 1 | 48 | 1 |
به فرّ کیانی یکی تخت ساخت
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5 | 1 | 48 | 2 |
چه مایه بدو گوهر اندر نشاخت
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5 | 1 | 49 | 1 |
که چون خواستی دیو برداشتی
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5 | 1 | 49 | 2 |
ز هامون به گردون برافراشتی
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5 | 1 | 50 | 1 |
چو خورشید تابان میان هوا
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5 | 1 | 50 | 2 |
نشسته بر او شاه فرمانروا
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5 | 1 | 51 | 1 |
جهان انجمن شد بر آن تخت او
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5 | 1 | 51 | 2 |
شگفتی فرومانده از بخت او
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5 | 1 | 52 | 1 |
به جمشید بر گوهر افشاندند
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5 | 1 | 52 | 2 |
مر آن روز را روز نو خواندند
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5 | 1 | 53 | 1 |
سر سال نو هرمز فرودین
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5 | 1 | 53 | 2 |
بر آسوده از رنج روی زمین
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5 | 1 | 54 | 1 |
بزرگان به شادی بیاراستند
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5 | 1 | 54 | 2 |
می و جام و رامشگران خواستند
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5 | 1 | 55 | 1 |
چنین جشن فرخ از آن روزگار
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5 | 1 | 55 | 2 |
به ما ماند از آن خسروان یادگار
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5 | 1 | 56 | 1 |
چنین سال سیصد همی رفت کار
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5 | 1 | 56 | 2 |
ندیدند مرگ اندر آن روزگار
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5 | 1 | 57 | 1 |
ز رنج و ز بدشان نبد آگهی
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5 | 1 | 57 | 2 |
میان بسته دیوان به سان رهی
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5 | 1 | 58 | 1 |
به فرمان مردم نهاده دو گوش
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5 | 1 | 58 | 2 |
ز رامش جهان پر ز آوای نوش
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5 | 1 | 59 | 1 |
چنین تا بر آمد بر این روزگار
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5 | 1 | 59 | 2 |
ندیدند جز خوبی از کردگار
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5 | 1 | 60 | 1 |
جهان سربهسر گشت او را رهی
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5 | 1 | 60 | 2 |
نشسته جهاندار با فرّهی
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5 | 1 | 61 | 1 |
یکایک به تخت مهی بنگرید
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5 | 1 | 61 | 2 |
به گیتی جز از خویشتن را ندید
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5 | 1 | 62 | 1 |
منی کرد آن شاه یزدان شناس
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5 | 1 | 62 | 2 |
ز یزدان بپیچید و شد ناسپاس
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5 | 1 | 63 | 1 |
گرانمایگان را ز لشگر بخواند
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5 | 1 | 63 | 2 |
چه مایه سخن پیش ایشان براند
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5 | 1 | 64 | 1 |
چنین گفت با سالخورده مهان
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5 | 1 | 64 | 2 |
که جز خویشتن را ندانم جهان
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5 | 1 | 65 | 1 |
هنر در جهان از من آمد پدید
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5 | 1 | 65 | 2 |
چو من نامور تخت شاهی ندید
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5 | 1 | 66 | 1 |
جهان را به خوبی من آراستم
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5 | 1 | 66 | 2 |
چنان است گیتی کجا خواستم
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5 | 1 | 67 | 1 |
خور و خواب و آرامتان از من است
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5 | 1 | 67 | 2 |
همان کوشش و کامتان از من است
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5 | 1 | 68 | 1 |
بزرگی و دیهیم شاهی مراست
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5 | 1 | 68 | 2 |
که گوید که جز من کسی پادشاست
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5 | 1 | 69 | 1 |
همه موبدان سرفگنده نگون
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5 | 1 | 69 | 2 |
چرا کس نیارست گفتن نه چون
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