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20231101.hi_42361_6
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रक्तचाप
उच्च रक्त चाप का निदान महत्वपूर्ण है जिससे रक्त चाप को सामान्य करके जटिलताओं को रोकने का प्रयास संभव हो। फार्मैकोॉजी विभाग, कोलोन विश्वविद्यालय, जर्मनी में हुई एक शोध के अनुसार चॉकलेट खाने और काली व हरी चाय पीने से रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। कनाडा के शोधकर्त्ता रॉस डी.फेल्डमैन के अनुसार उच्च रक्तचाप के रोगियों की विशेष देखभाल और जांच की जरूरत होती है, इससे दिल के दौरे की आशंका एक-चथाई कम हो सकती है वहीं मस्तिष्काघात की भी सम्भावना ४० प्रतिशत कम हो सकती है।
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रक्तचाप
जे एन सी, सात-२००३ के अनुसार रक्तचाप का निम्न वर्गीकरण, १८ वर्ष से अधिक वयस्कों हेतु बताया जाता है। यह कार्यालय में बैठे हुए लोगों की सही तरीके से ली गयी रक्तचाप रीडिंग्स पर आधारित औसत है।
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रक्तचाप
चिकित्सक के पास जांच हेतु पहुंचने के बाद कम-से-कम पांच मिनट के लिए आराम करने के बाद ही अपना रक्तदाब दिखाएं। लंबा चलने के बाद, सीढ़ियां चढ़ने, दौड़ने-भागने के तुरंत बाद जांच कराने पर रक्तदाब बढ़ा हुआ आता है। यह ध्यान रखना चाहिये कि जांच के समय कुर्सी पर आराम से बैठें हों व पैर जमीन पर रखें हों, तथा बांह और रक्तदाब मापक-यंत्र हृदय जितनी ऊंचाई पर होना चाहिए।
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रक्तचाप
जांच के आधा घंटा पहले से चाय, कॉफी, कोला ड्रिंक और धूम्रपान नहीं पीना चाहिये। इनके सेवन से रक्तदाब अगले १५ से २० मिनट के लिए बढ़ जाता है। रक्तदाब मापक-यंत्र के बांह पर बांधे जानेवाले कफ की चौड़ाई बांह की मोटाई के अनुसार होनी चाहिए। कफ इतना चौड़ा हो कि बांह का लगभग तीन-चौथाई घेरा उसमें आ जाए। बांह मोटी होने पर साधारण कफ से रक्तदाब लेने पर ब्लड प्रेशर की रीडिंग बढ़ी हुई होगी। यदि बांह पतली और कफ बड़ा है तो ठीक उलट होगा, रक्तदाब कम नपेगा। रक्तचाप मापने के लिए हमेशा जांचा-परखा यंत्र ही प्रयोग में लाएं।
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रक्तचाप
कई बार रक्तचाप दो जगह नापा जाएं तो अंतर मिलता है, यहां तक कि नर्स द्वारा नापा गया तो कम आता है और डाक्टर द्वारा नापा गया अधिक। कई बार कार्यालय में रक्तचाप नापा जाए तो अधिक आता है और घर में कम, इसे ह्वाईट कोट हाईपरटेंशन कहते हैं। इस तरह के बढ़े रक्तचाप का उपचार करने की अत्यावश्यकता नहीं होती है। यदि रक्तचाप मापक यंत्र (स्फीगमोमैनोमीटर) के बाँह में लगाने वाले कफ की चौड़ाई कम हो, उसे धीरे-धीरे या बहुत तेजी से फुलाया जाए तो रक्तचाप अधिक आएगा। बाँह में बाँधी गयी पट्टी को हॄदय के स्तर पर न रखा जाए तो रक्तचाप गलत आयेगा। इस तरह के कई और भी कारण हो सकतें है जिनका यदि विशेष ध्यान न रखा जाये तो रक्तचाप गलत आएगा। मरकरी के जो मापक-यंत्र हैं वे इलेक्ट्रानिक यंत्रों से ज्यादा सही रीडिंग देते हैं। इन सब कारकों के चलते यह आवश्यक है कि यदि एक बार रक्तचाप बढ़ा हुआ आता है तो तुरंत दवा शुरु न की जाए। कम से कम तीन बार कुछ दिनों के अंतराल पर रक्तचाप नापा जाए। यदि कई रीडिंग का औसत बढ़ा हो तो ही चिकित्सा शुरु होनी चाहिए। यदि रोगी भारी चिन्ता में हों तो थोड़ी देर के लिए रक्तचाप बढ़ जाएगा। पर्याप्त व्यायाम के बाद भी रक्तचाप बढ़ा मिलेगा। यह एक सामान्य प्रक्रिया है और इसका उपचार नहीं किया जाता। जहाँ दुविधा हो, वहां नयी तकनीक एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर मानिटरिंग द्वारा सही स्थिति का जायजा लिया जाता है।
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20231101.hi_5564_1
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
पहाड़ों पर ऊंचाई के कारण समान अक्षांश के समुद्र तल की तुलना में मौसम ठंडा रहता है। ये ठंडे मौसम पहाड़ों के पारिस्थितिक तंत्र को बहुत प्रभावित करते हैं जिसके कारण अलग-अलग ऊंचाई पर अलग-अलग पौधे और जानवर मिलते हैं। इलाके और जलवायु के अनुकूल न होने के कारण, पहाड़ों का उपयोग कृषि के लिए कम और संसाधन निष्कर्षण, जैसे कि खनन और लॉगिंग, और साथ ही मनोरंजन, जैसे पहाड़ पर चढ़ना और स्कीइंग, के लिए अधिक होता है। पर्वत पर बहुत ज्यादा मात्रा में वन होता है जो उस इलाके में वर्षा होने के लिए कारगर साबित होता है।
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20231101.hi_5564_2
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
एक पहाड़ पृथ्वी की पपड़ी का एक ऊंचा हिस्सा है, आम तौर पर खड़ी किनारों के साथ जो महत्वपूर्ण उजागर आधार दिखाते हैं। हालाँकि परिभाषाएँ अलग-अलग हैं, एक पर्वत एक सीमित शिखर क्षेत्र में एक पठार से भिन्न हो सकता है, और आमतौर पर एक पहाड़ी से ऊँचा होता है, जो आमतौर पर आसपास की भूमि से कम से कम 300 मीटर (1000 फीट) ऊपर होता है। कुछ पर्वत अलग-अलग शिखर हैं, लेकिन अधिकांश पर्वत श्रृंखलाओं में पाए जाते हैं।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
पर्वत विवर्तनिक बलों, कटाव, या ज्वालामुखी के माध्यम से बनते हैं, जो लाखों वर्षों तक के समय के पैमाने पर कार्य करते हैं। एक बार जब पहाड़ का निर्माण बंद हो जाता है, तो पहाड़ों को धीरे-धीरे अपक्षय की क्रिया के माध्यम से, ढलान और बड़े पैमाने पर बर्बादी के अन्य रूपों के साथ-साथ नदियों और हिमनदों द्वारा कटाव के माध्यम से समतल किया जाता है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
पहाड़ों पर उच्च ऊंचाई समान अक्षांश पर समुद्र तल की तुलना में ठंडी जलवायु का उत्पादन करती है। ये ठंडी जलवायु पहाड़ों के पारिस्थितिक तंत्र को बहुत प्रभावित करती है: अलग-अलग ऊंचाई पर अलग-अलग पौधे और जानवर होते हैं। कम मेहमाननवाज इलाके और जलवायु के कारण, पहाड़ों का उपयोग कृषि के लिए कम और संसाधन निष्कर्षण के लिए अधिक किया जाता है, जैसे कि खनन और लॉगिंग, मनोरंजन के साथ, जैसे पहाड़ पर चढ़ना और स्कीइंग।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
पृथ्वी पर सबसे ऊँचा पर्वत एशिया के हिमालय में माउंट एवरेस्ट है, जिसका शिखर समुद्र तल से 8,850 मीटर (29,035 फीट) ऊपर है। सौर मंडल के किसी भी ग्रह पर सबसे ऊंचा ज्ञात पर्वत मंगल ग्रह पर 21,171 मीटर (69,459 फीट) पर ओलंपस मॉन्स है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
धरती पर करोड़ों वर्ष पूर्व जब हलचल हुयी तब विशाल भू भाग सरकते हुए आपस में टकराए तब वहां की जमीन अप्रत्याशित बल के कारण ऊपर उठ गयी जिससे विशाल पर्वतों का निर्माण हुआ। पहाड़ की कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत परिभाषा नहीं है। पर्वत को परिभाषित करने के लिए ऊंचाई, आयतन, राहत, खड़ीपन, दूरी और निरंतरता को मानदंड के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
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20231101.hi_5564_7
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
क्या किसी भू-आकृति को पर्वत कहा जाता है, यह स्थानीय उपयोग पर निर्भर हो सकता है। लॉटन, ओक्लाहोमा, संयुक्त राज्य अमेरिका के बाहर माउंट स्कॉट, अपने आधार से अपने उच्चतम बिंदु तक केवल 251 मीटर (823 फीट) है। विट्टो डिक्शनरी ऑफ फिजिकल जियोग्राफी में कहा गया है, "कुछ अधिकारी 600 मीटर (1,969 फीट) से ऊपर की ऊंचाई को पहाड़ों के रूप में मानते हैं, जिन्हें नीचे की पहाड़ियों के रूप में संदर्भित किया जाता है।"
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
यूनाइटेड किंगडम और आयरलैंड गणराज्य में, एक पर्वत को आमतौर पर कम से कम 2,000 फीट (610 मीटर) ऊंचे किसी भी शिखर के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो आधिकारिक यूके सरकार की परिभाषा के अनुरूप है कि पहुंच के प्रयोजनों के लिए एक पहाड़ है 2,000 फीट (610 मीटर) या उच्चतर का शिखर। इसके अलावा, कुछ परिभाषाओं में एक स्थलाकृतिक प्रमुखता की आवश्यकता भी शामिल है, जैसे कि पहाड़ आसपास के इलाके से 300 मीटर (984 फीट) ऊपर उठता है। एक समय में यू.एस. बोर्ड ऑन ज्योग्राफिक नेम्स ने एक पहाड़ को 1,000 फीट (305 मीटर) या उससे अधिक के रूप में परिभाषित किया था, लेकिन 1970 के दशक से परिभाषा को छोड़ दिया है। इस ऊँचाई से कम किसी भी समान भू-आकृति को पहाड़ी माना जाता था। हालांकि, आज, संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) ने निष्कर्ष निकाला है कि इन शर्तों की अमेरिका में तकनीकी परिभाषाएं नहीं हैं।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पर्वत
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की "पर्वतीय पर्यावरण" की परिभाषा में निम्नलिखित में से कोई भी शामिल है:
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0
गुणसूत्र
अधिक चौड़े होने के कारण यह है कि एक गुणसूत्र अपने समान एक दूसरे केंद्रक-त्र का संश्लेषण करता है। साधारण अवस्था में समसूत्रण के समय ये दोनों सूत्र एक दूसरे से पृथक्‌ हो जाते हैं, परंतु महागुणसूत्र में यह नहीं होता। दोनों सूत्र एक दूसरे से जुड़े ही रह जाते हैं। महागुणसूत्र की संख्या साधारण गुणसूत्र की संख्या की आधी होती है, क्योंकि प्रत्येक सूत्र अपने समान दूसरे सूत्र से युग्मित हो जाता है। इस घटना को दैहिक युग्मन (Somatic pairing) कहते हैं।
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गुणसूत्र
जंतुओं में विचित्र प्रकार का एक और भी गुणसूत्र पाया जाता है। इसक लैंपब्रश गुणसूत्र (Lampbrush chromosome) कहते हैं। ये गुणसूत्र ऐसे जंतुओं के अंडों के केंद्रकों में पाए जाते हैं जिनमें अंडपीत की मात्रा अधिक होती है, जैसे मछली, उभयचर, उरग, पक्षीगण इत्यादि। गुणसूत्र साधारण डिप्लोटीन-डायाकिनीसिस (Diplotene-diakinesis) गुणसूत्रों के समान दो दो युग्मित सूत्रों के बने होते हैं। दोनों युग्मित सूत्र कुछ स्थानों पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं और शेष स्थानों पर एक दूसरे से दूर-दूर रहते हैं। इन जोड़ों को किएज्मा समझा जाता है। प्रत्येक सूत्र पर, जिसकों क्रोमोनिमा (Chromonema) कहते हैं, स्थान स्थान पर विभिन्न परिसाण की कणिकाएँ होती हैं जिनको क्रोमोमियर्स (Chromomeres) कहते हैं। प्रत्येक क्रोमोमियर से एक जोड़ी या अधिक पार्श्वपाश (lateral loops) जुड़े हुए होते है। पार्श्वपाश भी क्रोमोनिमा के सदृश सूत्र का बना होता है, परंतु इसके चारों ओर रिबोन्यूक्लिओ-प्रोटीन कणिकाएँ एकत्रित हो जाती हैं जिससे ये सूत्र मोटे दिखाई देते हैं। क्रोमोमियर भी क्रोमोनिमा से संतत होते हैं। केंद्रकाएँ विशेष गुणसूत्र पर उत्पन्न होती हैं।
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गुणसूत्र
अधिकांश जंतुओं की प्रत्येक कोशिका में गुणसूत्रों के दो एकात्म कुलक होते हैं। परिपक्व लिंगकोशिकाओं (mature sex-cells) में एक कुलक रह जाता है। ऐसे प्राणी और कोशिकाएँ द्विगणित (diploid) कही जाती हैं, परंतु कुछ प्राणियों, विशेषत: पौधों, में दो से अधिक कुलक गुणसूत्रों के होते हैं यह बहुगुणित (polyploid) कहे जाते हैं।
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गुणसूत्र
यदि किसी द्विगुणित प्राणी के केंद्रकसुत्र दुगुने हो जाए, जिससे उसकी कोशिकाएँ में प्रत्येक सूत्र चार चार हों जैसे, (क1 क1 क1 क1; ख1 ख1 ख1 ख1, ग1 ग1 ग1 ग1 इत्यादि) तो ऐसे प्राणी का आटोपॉलिप्लॉइड (आटीटेट्राप्लॉइड) [autopolyploid (autotetraploid)] कहते हैं। यदि किसी द्विगुणित संकर (deploid hybrid) के गुणसूत्र दुगुने हो जाए तो ऐसे प्राणी को ऐलोपॉलिप्लॉइड (allopolyploid) कहते हैं। यदि एक द्विगुणित प्राणी का, जिसके केंद्रकसुत्र क1 क1 ख1 ख1 ग1 ग1 इत्यादि हैं, किसी दूसरे प्राणी से, जिसके गुणसूत्र क2 क2 ख2 ख2 ग2 ग2 इत्यादि हैं, संकरण किया जाए तो उसकी संतान के गुणसूत्र क1 क2 ख1 ख2 ग1 ग2 इत्यादि होंगे। क1 क2 ख1 ख2 इत्यादि एक दूसरे से भिन्न होंगे और इनमें साधारणत: युग्मन नहीं होगा। यदि इस प्राणी के गुणसूत्र दुगुने हो जाए तो उनकी कोशिकाएँ में क1 क1 क2 क2; ख1 ख1ख2 ख2; ग1 ग1 ग2 ग2, इत्यादि गुणसूत्र होंगे। यह ऐलोपॉलिप्लॉइड (ऐलोटेट्राप्लॉइड) कहा जाएगा। पॉलिप्लॉइड में चार से अधिक कुलक भी हो सकते हैं।
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गुणसूत्र
यह स्पष्ट है कि ऑटोपॉलिप्लॉइड में ज़ाइगोटीन अवस्था में चतु:संयोजक (quadrivalents) उत्पन्न हो जाएँगे, क्योंकि प्रत्येक प्रकार के चार-चार गुणसूत्र उपस्थित हैं और चार सूत्रों के युग्मन से एक चतु:संयोजक बनता है। कोशिका विभाजन के समय प्रत्येक ध्रुव को बराबर-बराबर संख्या में गुणसूत्र नहीं मिलेंगे। प्राय: ऐसा होता है कि एक चतु:संयोजक के टूटने से किसी ध्रुव पर तीन सूत्र पहुँचे और उसके समुख ध्रुव पर एक ही सूत्र पहुँचे। कोशिका विभाजन के अंत पर बने हुए संतति कोशिकाओं (daughter cells) में गुणसूत्र या तो अधिक संख्या में होंगे या कम में और ऐसे असंतुलन का परिणाम यह होता है कि कोशिका मर जाती है। इसी कारण ऑटोटेट्राप्लॉइड बहुत कम उर्वर होते हैं। ऑटोटेट्राप्लॉइड पौधे साधारण द्विगुणित पौधों से बहुत बड़े होते हैं तथा उनके बीज भी बहुत बड़े होते हैं, जिससे उर्वरता कम होने पर भी ये गृहस्थी के लिये अधिक लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। ठंढक पहुँचाकर, या कुछ ऐलकेलायडों के प्रभाव से, पौधे आटोपॉलिप्लाइड बनाए जा सकते हैं।
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गुणसूत्र
ऐलोटेट्राप्लॉइड में दशा इसके विपरीत होती हैं। यदि दोनों आदिम मातापिता के सूत्र एक दूसरे से पूर्ण रूप से विभिन्न हों तो ऐलोपॉलिप्लाइड क्रियात्मक रूप से द्विगुणित है और पूर्ण रूप से उर्वर होगा। जैसे, यदि किसी संकर में क1 क2, ख1 ख2, ग1 ग2 से सूत्र सर्वथा भिन्न हों तो ऐसा संकर बंध्या होगा, परंतु इसके गुणसूत्रों के दुगुने होने से यह अवस्था बदल जायगी। ऐसी कोशिकाओं में क1 क1 क2 क2, ख1 ख1 ख2 ख2, ग1 ग1 ग2 ग2 इत्यादि सूत्र होंगे और जिन शाखाओं में ऐसी कोशिकाएँ होंगी उनपर फूल लगेंगे, क्योंकि ऐसी कोशिकाओं में माइओटिक विभाजन सफल होगा, क1 क1 से युग्मित होगा, ख1 ख1 से इत्यादि।
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गुणसूत्र
डी एन ए ही आनुवंशिक (hereditary) पदार्थ है। डी एन ए (D N A) अणु की संरचना में चार कार्बनिक समाक्षार सम्मिलित होते हैं : दो प्यूरिन (purines), दो पिरिमिडीन्स (pyrimidines), एक चीनी-डिआक्सीरिबोज (Deoxyribose) और फासफ़ोरिक अम्ल (Phosphoric acid)। प्यूरिन में ऐडिनिन (Adenine) और ग्वानिन (Guanine) होते है और पिरिमिडीन में थाइमीन (Thymine) और साइटोसिन (Cytosine)। डी एन ए (D N A) के एक अणु में दो सूत्र होते हैं, जो एक दूसरे के चारों और सर्पिल रूप में वलयित (spirallyicoiiled) होते है। प्रत्येक डी एन ए (D N A) सूत्र में एक के पीछे एक चारों कार्बनिक समाक्षार इस क्रम से होते हैं-थाइमीन, साइटोसिन, ऐडिनीन और ग्वानिन, एवं वे परस्पर एक विशेष ढंग से जुड़े होते हैं।
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गुणसूत्र
इन चार समाक्षारों और उनसे संबंधित शर्करा और फास्फोरिक अम्ल अणु का एक एकक टेट्रान्यूक्लीओटिड (Tetranucleotide) होता है और कई सहस्त्र टेट्रान्यूक्लीओटिडों का एक डी एन ए (D N A) अणु बनता है।
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गुणसूत्र
विभिन्न प्राणियों के डी एन ए की विभिन्नता का कारण है - समाक्षारों के अनुक्रम में अंतर होना। डी एन ए और ऐसा ही एक दूसरा न्यूक्लिक अम्ल आर एन ए (R N A) कार्बनिक समाक्षार की उपस्थिति के कारण पराबैंगनी को अधिकांश 2,600 एंगस्ट्रॉम के क्षेत्र में अंतर्लीन (absorb) करते हैं। इसी आधार पर डी एन ए का एक कोशिका संबंधी मात्रात्मक आगमन किया जाता है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%AA
लक्षद्वीप
लक्षद्वीप (संस्कृत: लक्षद्वीप, एक लाख द्वीप), भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट से 200 से 440 किमी (120 से 270 मील) दूर लक्षद्वीप सागर में स्थित एक द्वीपसमूह है। पहले इन द्वीपों को लक्कादीव-मिनिकॉय-अमिनीदिवि द्वीप के नाम से जाना जाता था। यह द्वीपसमूह भारत का एक केन्द्र शासित प्रदेश होने के साथ साथ एक जिला भी है। पूरे द्वीपसमूह को लक्षद्वीप के नाम से जाना जाता है, हालाँकि भौगोलिक रूप से यह केवल द्वीपसमूह के केन्द्रीय उपसमूह का नाम है। यह द्वीपसमूह भारत का सबसे छोटा केंद्र-शासित प्रदेश है और इसका कुल सतही क्षेत्रफल सिर्फ 32 वर्ग किमी (12 वर्ग मील) है, जबकि अनूप क्षेत्र 4,200 वर्ग किमी (1,600 वर्ग मील), प्रादेशिक जल क्षेत्र 20,000 वर्ग किमी (7,700 वर्ग मील) और विशेष आर्थिक क्षेत्र 400,000 वर्ग किमी (150,000 वर्ग मील) में फैला है। इस क्षेत्र के कुल 10 उपखण्डों साथ मिलकर एक भारतीय जनपद की रचना करते हैं। कवरत्ती लक्षद्वीप की राजधानी है, और यह द्वीपसमूह केरल उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। यह द्वीपसमूह लक्षद्वीप-मालदीव-चागोस समूह के द्वीपों का सबसे उत्तरी भाग है, और यह द्वीप एक विशाल समुद्रमग्न पर्वत-शृंखला चागोस-लक्षद्वीप प्रवाल भित्ति के सबसे उपरी हिस्से हैं।
0.5
6,228.844786
20231101.hi_1695_1
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%AA
लक्षद्वीप
चूँकि द्वीपों पर कोई आदिवासी आबादी नहीं हैं, इसलिए विशेषज्ञ इन द्वीपों पर मानव के बसने का अलग-अलग इतिहास सुझाते हैं। पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार 1500 ईसा पूर्व के आसपास इस क्षेत्र में मानव बस्तियाँ मौजूद थीं। नाविक एक लंबे समय से इन द्वीपों को जानते थे, इसका संकेत पहली शताब्दी ईस्वी से एरिथ्रियन सागर के पेरिप्लस क्षेत्र के एक अनाम संदर्भ से मिलता है। द्वीपों का उल्लेख ईसा पूर्व छठी शताब्दी की बौद्ध जातक कथाओं में भी किया गया है। सातवीं शताब्दी के आसपास मुस्लिमों के आगमन के साथ यहाँ इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ। मध्ययुगीन काल के दौरान, इस क्षेत्र में चोल राजवंश और कैनानोर के साम्राज्य का शासन था। कैथोलिक पुर्तगाली 1498 के आसपास यहाँ पहुँचे, लेकिन 1545 तक उन्हें यहाँ से खदेड़ दिया गया। इस क्षेत्र पर तब अरक्कल के मुस्लिम घराने का शासन था, उसके बाद टीपू सुल्तान का। 1799 में टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद अधिकांश क्षेत्र ब्रिटिशों के पास चले गए और उनके जाने के बाद, 1956 में केंद्र शासित प्रदेश का गठन किया गया।
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लक्षद्वीप
समूह के सिर्फ दस द्वीपों पर मानव आबादी है। 2011 की भारतीय जनगणना के अनुसार, केन्द्र-शासित प्रदेश की कुल जनसंख्या 64,473 थी। अधिकांश आबादी स्थानीय मुस्लिमों की है और उनमें से भी ज्यादातर सुन्नी सम्प्रदाय के शाफी सम्प्रदाय के हैं। द्वीप समूह जातीय रूप से निकटतम भारतीय राज्य केरल के मलयाली लोगों के समान हैं। लक्षद्वीप की अधिकांश आबादी मलयालम बोलती है जबकि और मिनिकॉय द्वीप पर माही या माह्ल भाषा सबसे अधिक बोली जाती है। अगत्ती द्वीप पर एक हवाई अड्डा मौजूद है। लोगों का मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना और नारियल की खेती है, साथ ही टूना मछली का निर्यात भी किया जाता है।
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लक्षद्वीप
इस क्षेत्र के शुरुआती उल्लेख एरिथ्रियन सागर के पेरिप्लस के एक अनाम लेखक के लेखों में मिलते है। संगम पाटिरुपट्टू में चेरों द्वारा द्वीपों के नियन्त्रण के सन्दर्भ भी मिलते हैं। स्थानीय परम्पराएँ और किंवदन्तियाँ के अनुसार इन द्वीपों पर पहली बसावत केरल के अन्तिम चेरा राजा चेरामन पेरुमल की काल में हुई थी। समूह में सबसे पुराने बसे हुए द्वीप अमिनी, कल्पेनी अन्दरोत, कवरत्ती और अगत्ती हैं। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि पाँचवीं और छठी शताब्दी ईस्वी के दौरान इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म प्रचलन में था। लोकप्रिय परम्परा के अनुसार, 661 ईस्वी में उबैदुल्लाह द्वारा इस्लाम को लक्षद्वीप पर लाया गया था। उबैदुल्लाह की कब्र अन्दरोत द्वीप पर स्थित है। 11 वीं शताब्दी के दौरान, द्वीपसमूह पर अन्तिम चोल राजाओं और उसके बाद कैनानोर के राज्य का शासन था।
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लक्षद्वीप
16 वीं शताब्दी में, ओरमुज और मालाबार तट और सीलोन के दक्षिण के बीच के समुद्र पर पुर्तगालियों का राज था। पुर्तगालियों ने 1498 की शुरुआत में द्वीपसमूह पर नियन्त्रण कर लिया था, और इसका मुख्य उद्देश्य नारियल की जटा से बने माल के दोहन था, 1545 में पुर्तगालियों को द्वीप से भगा दिया गया। 17 वीं शताब्दी में, द्वीप कन्नूर के अली राजा/ अरक्कल बीवी के शासन में आ गए, जिन्होंने इन्हें कोलाथिरिस से उपहार के रूप में प्राप्त किया था। अरब यात्री इब्न-बतूता की कहानियों में द्वीपों का भी विस्तार से उल्लेख है।
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लक्षद्वीप
1787 में अमिनिदिवि समूह के द्वीप (अन्दरोत, अमिनी, कदमत, किल्तन, चेतलत, और बितरा) टीपू सुल्तान के शासन के तहत आ गए। तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद यह ब्रिटिश नियन्त्रण में चले गए और इन्हें दक्षिण केनरा से जोड़ा गया। बचे हुए द्वीपों को ब्रिटिश ने एक वार्षिक अदाएगी के बदले में काननोर के को सौंप दिया। अरक्कल परिवार के बकाया भुगतान करने में विफल रहने पर अंग्रेजों ने यह द्वीप फिर से अपने नियन्त्रण में ले लिए। ये द्वीप ब्रिटिश राज के दौरान मद्रास प्रेसीडेंसी के मालाबार जिले से जुड़े थे।
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लक्षद्वीप
1 नवम्बर 1956 को, भारतीय राज्यों के पुनर्गठन के दौरान, प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए लक्षद्वीप को मद्रास से अलग कर एक केन्द्र-शासित प्रदेश के रूप में गठित किया गया। 1 नवम्बर 1973 के नया नाम अपनाने से पहले इस क्षेत्र को लक्कादीव-मिनिकॉय-अमिनीदिवि के नाम से जाना जाता था।
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लक्षद्वीप
मध्य पूर्व के लिए भारत की महत्वपूर्ण जहाज मार्गों की सुरक्षा के लिए, और सुरक्षा कारणों में द्वीपों की बढ़ती प्रासंगिकता को देखते हुए, एक भारतीय नौसेना आधार, आईएनएस द्वापरक्ष, को कवरत्ती द्वीप पर कमीशन किया गया।
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लक्षद्वीप
लक्षद्वीप द्वीपसमूह में बारह प्रवाल द्वीप (एटोल), तीन प्रवाल भित्ति (रीफ) और पाँच जलमग्‍न बालू के तटों को मिलाकर कुल 36 छोटे बड़े द्वीप हैं। प्रवाल भित्ति भी वास्तव में प्रवाल द्वीप ही हैं, हालाँकि ज्यादातर जलमग्न हैं, केवल थोड़ा सा वनस्पति रहित रेतीला हिस्सा पानी के निशान से ऊपर है। जलमग्न बालू तट भी जलमग्न प्रवाल द्वीप हैं। ये द्वीप उत्‍तर में 8 अंश और 12.3 अक्षांश पर तथा पूर्व में 71 अंश और 74 अंश देशान्तर पर केरल तट से लगभग 280 से 480 कि॰मी॰ दूर अरब सागर में फैले हुए हैं।
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रक्तदान
लंबे हाथ की त्वचा के नजदीकी शिरा से रक्त लिया जाता है, आमतौर पर कोहनी के भीतर माध्यिका प्रकोष्टीय शिरा से. त्वचा के बैक्टेरिया से संचित रक्त को दूषित होने से रोकने और साथ में दाता की त्वचा में जहां सूई लगायी जाती है वहां से संक्रमण के रोकथाम के लिए रक्त वाहिका के ऊपर की त्वचा को आयोडीन या क्लोर्हेक्सीडाइन जैसे एंटीसेप्टिक से साफ किया जाता है।
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रक्तदान
छेदन के बल को कमतर करने के लिए एक बड़ी सूई (16-17 गेज की) का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि जब लाल रक्त कोशिकाएं सूई से होकर बहती है तो उनको नुकसान हो सकता है। इस प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए और हाथ की शिरा के रक्तचाप में वृद्धि के लिए कभी-कभी एक टूनिकेट ऊपरी बांह में लपेट दिया जाता है। दाता को किसी वस्तु को हाथ में पकड़ने या मुट्ठी को कसते रहने के लिए भी कहा जा सकता है, ऐसा बार-बार करने से शिरा में रक्त प्रवाह तेज होता है।
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रक्तदान
दाता शिरा से एक कंटेनर में रक्त एकत्रित करना सबसे आम तरीका है। किसी देश के आधार पर निष्कासित रक्त की मात्रा 200 मिलीलीटर से 550 मिलीलीटर तक होती है, लेकिन आमतौर पर 450-500 मिलीलीटर तक होती है। रक्त आमतौर पर लचीले प्लास्टिक की थैली में संग्रहित किए जाते हैं, जिसमें सोडियम साइट्रेट (sodium citrate), फॉस्फेट (phosphate), डेक्सट्रोज (dextrose) और कभी-कभी एडेनाइन (adenine) भी होता है। यह संयोजन भंडारण के दौरान रक्त को थक्के बनने से बचाता है और संरक्षित रखता है। अन्य रसायन कभी कभी प्रसंस्करण के दौरान जोड़े जाते हैं।
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रक्तदान
अपरिवर्तित रक्त से प्लाज्मा का इस्तेमाल आधान के लिए प्लाजमा बनाने में किया जा सकता है या फ्रैक्शनेशन (fractionation यानि किसी पदार्थ अथवा मिक्‍श्‍चर के घटकों का पृथक करना) करके प्रसंस्करण कर इसका इस्तेमाल अन्य औषधि बनाने में किया जा सकता है। सूखे प्लाज्मा का विकसित रूप है, जिसका इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जख्मों का इलाज करने में किया गया और इसका भिन्न रूप अब भी विभिन्न किस्म के औषधि बनाने में किया जाता है।
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रक्तदान
अफेरेसिस रक्तदान का एक तरीका है, जहां रक्त एक उपकरण के माध्यम से होकर गुजरता है जो एक घटक विशेष को अलग करता है और बाकी बचे घटकों को दाता को वापस कर दिया जाता है। आमतौर पर लौटया जानेवाला घटक लाल रक्त कोशिकाएं होती हैं, जितनी मात्रा में रक्त लिया जाता है उसे वापस करने में लंबा समय लग जाता है। इस तरीके का इस्तेमाल कर कोई व्यक्ति सुरक्षित रूप से प्लाज्मा या बिंबाणु (प्लेटलेट्स) अधिक से अधिक बार दान कर सकता है, बनिस्पत अपरिवर्तित रक्त दान के. एक ही दान में प्लाज्मा और बिंबाणु दोनों देनेवाले दाता के साथ इन दोनों को जोड़ा जा सकता है।
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रक्तदान
बिंबाणु को भी अपरिवर्तित रक्त से अलग किया जा सकता हैं, लेकिन वे बहुत सारे दानों से इकट्ठा किया जाना चाहिए। उपचारात्मक खुराक के लिए रक्त की तीन से दस इकाइयों की आवश्यकता होती है। प्लेटलेटफेरेसिस (Plateletpheresis) प्रत्येक दान से कम से कम एक पूर्ण खुराक प्रदान करता है।
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रक्तदान
प्लाजमाफेरेसिस (Plasmapheresis) का बार-बार इस्तेमाल प्लाज्मा स्रोतइकट्ठा करने के लिए होता है, जिसका उपयोग अपरिवर्तित रक्त से प्लाजमा बनाने की तरह औषधियों के निर्माण में होता है। प्लेटलेटफेरेसिस के समय ही प्लाज्मा इकट्ठा करने को कभी-कभी समवर्ती प्लाज्मा भी कहा जाता है।
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रक्तदान
सामान्य एकल दान और आधान के लिए श्वेत रक्त कोशिका को इकट्ठा करने की तुलना में अफेरेसिस का भी ज्यादा इस्तेमाल लाल रक्त कोशिकाएं इकट्ठा करने में होता है।
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रक्तदान
दाताओं को दान के बाद आमतौर पर दान स्थल में 10-15 मिनट तक रखा जाता है, क्योंकि सबसे अधिक प्रतिकूल प्रतिक्रिया दान के दौरान या दान के तुरंत बाद होती है। रक्त केंद्र आमतौर पर आरोग्य लाभ के लिए दाता को चाय और विस्कुट जैसी हल्की-फुलकी वस्तुएं खाने-पीने को देते हैं या दोपहर के भोजन के लिए भत्ता प्रदान करते हैं। सूई लगाये जानेवाले स्थान को बैंडेज से ढंक दिया जाता है और दाता को कई घंटे तक बैंडेज बांधे रखने का निर्देश दिया जाता है।
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कंपनी
(13) कम्पनी का सामाजिक स्वरूपः कम्पनी का उस समाज के प्रति भी उत्तरदायित्व है जिसके लिए निर्माण हुआ है तथा जिसमें वह विकास करती है समाजवादी व्यवस्थाओं में किसी भी संयुक्त पूंजी संगठन को मात्र लाभार्जन का संकुचित उद्देश्य लेकर नहीं चलने दिया जा सकता है।
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कंपनी
(14) कम्पनी का सामाजिक चरित्रः कम्पनी से सम्बन्धित आधुनिक विचारधारा के अनुसार समाज के प्रति भी उत्तरदायित्व माना जाने लगा है।
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कंपनी
(15) उधार लेनाः समामेलन के पश्चात् कम्पनी एक वैधानिक व्यक्ति हो जाती है। अतः अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऋण ले सकती है और इसके लिए यदि आवश्कता हो तो वह अपनी चल व अचल सम्पत्ति को बन्धक रख सकती है।
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कंपनी
(16) कम्पनी का समापनः कम्पनी का जन्म राज नियम के द्वारा होता है और जीवन पर्यन्त राज नियम के अनुरूप ही कार्य करती है। कम्पनी का समापन भी राज नियम के द्वारा ही होता है अतः कहा जाता है कि किसी भी कम्पनी का समापन राज नियम के बिना नहीं हो सकता है।
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कंपनी
(17) निकाय वित्त व्यवस्था : अतिरिक्त कार्य विस्तार की दशा में अधिक धनराशि की आवश्यकता होने पर कम्पनी, पार्षद सीमा नियम के अनुसार अंशों एवं ऋण पत्रों का भी निर्गमन कर सकती है इस प्रकार अंशों एवं ऋण पत्रों के रूप में निकाय वित्त प्राप्त करने की सुविधा केवल कम्पनी रूपी प्रारूप में ही उपलब्ध है, अन्य प्रारूपों में नहीं।
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कंपनी
(18) कम्पनी एक नागरिक नहीं : कम्पनी के सभी सदस्य भारत के नागरिक हों तो भी कम्पनी, भारत की नागरिक नहीं बन सकती है। ठीक उसी प्रकार की जिस तरह से कम्पनी के सभी सदस्यों का विवाह हो जाने से, कम्पनी का विवाह नहीं हो जाता है। किसी कम्पनी को सामान्य नागरिक के मूल अधिकार प्राप्त नहीं हैं फिर भी कम्पनियाँ अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए न्यायालय की शरण ले सकती है।
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कंपनी
(19) राष्ट्रीयता एवं निवास स्थान : यद्यपि कम्पनी देश की नागरिक नहीं होती है किन्तु उसकी राष्ट्रीयता अवश्य होती है। कम्पनी की राष्ट्रीयता उस देश की मानी जाती है जिसमें उसका समामेलन होता है। कम्पनी का निवास स्थान वह होता है जहाँ से कम्पनी के व्यवसाय का प्रबन्ध एवं नियन्त्रण किया जाता है। कम्पनी के साथ पत्राचार करने कोई अन्य सन्देश देने-लेने की दृष्टि से कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय को ही कम्पनी का निवास स्थान माना जाता है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%80
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(20) कम्पनी का चरित्रः कम्पनी एक कृत्रिम व्यक्ति है जिसका अपना दिल, दिमाग, आत्मा आदि नहीं होता है। यह किसी के प्रति निष्ठावान तो किसी अन्य के प्रति निष्ठाहीन भी नहीं हो सकती है। यह न किसी की मित्र होती है और न शत्रु। वास्तव में कम्पनी का अपना कोई चरित्र नहीं होता है। किन्तु कभी-कभी कोई कम्पनी शत्रु का चरित्र धारण कर सकती है।
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कंपनी
(21) स्थायी अस्तित्वः कम्पनी का अस्तित्व स्थायी होता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि कम्पनी के अंश हस्तान्तरणीय होते हैं तथा कम्पनी का अपने सदस्यों से पृथक् अस्तित्व होता है। परिणामस्वरूप कम्पनी में कोई नया सदस्य बनता है या सदस्यता छोड़ता है अथवा सदस्य मर जाता है अथवा दिवालिया या पागल हो जाता है तो भी कम्पनी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वास्तव में कम्पनी का जन्म विधान प्रावधानों के अनुसार होता है। अतः कम्पनी का समापन भी विधान में वर्णित प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही हो सकता है। कम्पनी तो तब भी चलती रहती है चाहे कम्पनी के निर्माण करने वाले समस्त सदस्यों की ही मृत्यु क्यों न हो जाय।
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कुष्ठरोग
अनुनासिक श्लेष्म, विशेष रूप से व्रण-युक्त श्लेष्म, का महत्व शैफेर (Schäffer) द्वारा 1898 में ही पहचान लिया गया था। लेप्रोमेटस कुष्ठरोग में अनुनासिक श्लेष्मक घावों से दण्डाणु की मात्रा का प्रदर्शन शेपर्ड द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया था और उनकी संख्या 10,000 से 10,000,000 के बीच थी। पेडले (Pedley) ने बताया कि अधिकांश लेप्रोमेटस मरीजों की बहती हुई नाक से लिये गये अनुनासिक स्रावों में कुष्ठरोग दण्डाणु प्राप्त हुए. डैवे (Davey) और रीस (Rees) ने संकेत दिया कि लेप्रोमेटस मरीजों के अनुनासिक स्राव में प्रतिदिन 10 मिलियन विकासक्षम जीव उत्पन्न हो सकते हैं।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%97
कुष्ठरोग
मानव शरीर में एम. लेप्री (M. leprae) के प्रवेश का मार्ग भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है: त्वचा और ऊपरी श्वसन तंत्र सबसे संभावित मार्ग हैं। पुराने अनुसंधान जहां त्वचा मार्ग का अध्ययन कर रहे थे, वहीं हालिया अनुसंधान द्वारा श्वसन तंत्र का समर्थन बढ़ता जा रहा है। रीस (Rees) और मैकडॉगाल (McDougall) ने प्रतिरक्षा-प्रतिबन्धित चूहों में एम. लेप्री (M. leprae) युक्त के माध्यम से कुष्ठरोग का प्रयोगात्मक संचरण कर पाने में सफलता प्राप्त की, जिससे मनुष्यों में भी इसी तरह की संभावना व्यक्त की गई। नग्न चूहों के साथ किये गये उन परीक्षणों के सफल परिणाम मिलने की जानकारी प्राप्त हुई है, जिनमें एम. लेप्री (M. leprae) को सामयिक अनुप्रयोग के द्वारा अनुनासिक छिद्र से प्रविष्ट किया गया था। संक्षेप में, श्वसन तंत्र के माध्यम से प्रवेश सर्वाधिक संभावित मार्ग है, हालांकि अन्य मार्ग, विशेष रूप से टूटी हुई त्वचा, की उपेक्षा नहीं की जा सकती. सीडीसी (CDC) ने इस बीमारी के संचरण के बारे में निम्नलिखित धारणा व्यक्त की है: "हालांकि हैन्सेन के रोग के संचरण का मार्ग अनिश्चित बना हुआ है, लेकिन अधिकांश शोधकर्ता मानते हैं कि सामान्यतः एम. लेप्री (M. leprae) श्वसन बूंदों के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। "
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%97
कुष्ठरोग
कुष्ठरोग में, उष्मायन काल और संक्रमण के समय तथा बीमारी की शुरुआत के मापन दोनों के ही लिये सन्दर्भ बिंदु परिभाषित कर पाना कठिन है; पहला वाला पर्याप्त प्रतिरक्षात्मक उपकरणों के कारण और दूसरा बीमारी की धीमी शुरुआत के कारण. इसके बावजूद, विभिन्न शोधकर्ताओं ने कुष्ठरोग के लिये उष्मायन काल का मापन करने का प्रयास किया है। न्यूनतम उष्मायन काल कुछ सप्ताहों जितना संक्षिप्त होने की जानकारी मिली है और यह नवजात शिशुओं में कुष्ठरोग की अक्सर होने वाली घटनाओं पर आधारित है। अधिकतम उष्मायन काल 30 वर्ष, या उससे अधिक, लंबा होने की जानकारी मिली है, जैसा कि युद्ध के उन पुराने सिपाहियों में देखा गया है, जिनके बारे में यह ज्ञात है कि वे थोड़े समय के लिये वे संक्रमण के स्थानीय क्षेत्रों के संपर्क में आये थे, लेकिन अन्यथा वे गैर-स्थानीय क्षेत्रों में रह रहे थे। सामान्यतः इस बात पर सहमति है कि औसत उष्मायन काल तीन से पांच वर्षों का होता है।
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20231101.hi_215946_22
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%97
कुष्ठरोग
वेनेज़ुएला के डॉ॰ जैसिन्टो कॉन्विट (Dr. Jacinto Convit) ने तपेदिक के टीके और माइटोकॉन्ड्रियम लैप्री (Mycobacterium leprae) से एक टीके का संश्लेषण किया, एक असाधारण कार्य, जिसके लिये उन्हें 1990 के दशक के अंत में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के लिये नामांकन प्राप्त हुआ।
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कुष्ठरोग
हालिया परीक्षणों में, राइफैम्पिसिन (rifampicin) की एकल खुराक ने बीमारी से संपर्क के दो वर्ष बाद कुष्ठरोग विकसित होने की दर को 57% कम कर दिया; इस अवधि में राइफैम्पिसिन (rifampicin) के साथ किये गये 265 उपचारों ने कुष्ठरोग के एक मामले को रोका. एक गैर-यादृच्छिकृत अध्ययन में पाया गया कि राइफैम्पिसिन (rifampicin) तीन वर्ष बाद कुष्ठरोग के नये मामलो की संख्या 75% घटा दी.
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कुष्ठरोग
बीसीजी (BCG) कुष्ठरोग तथा साथ ही तपेदिक के खिलाफ सुरक्षा की एक परिवर्तनीय मात्रा प्रस्तावित करती है।
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कुष्ठरोग
इस बीमारी को मिटाने की राह में आ रही स्थायी बाधाओं से निपटने के प्रयासों में पहचान में सुधार, मरीजों और लोगों को इसके कारणों के बारे में शिक्षित करना और इस बीमारी, जिसके मरीजों को ऐतिहासिक रूप से “अस्वच्छ” या “ईश्वर द्वारा शापित” मानकर बहिष्कृत किया जाता रहा है, से जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं से लड़ना शामिल है। कुष्ठरोग आनुवंशिक बीमारी नहीं है। जहां वर्जनाएं मज़बूत हैं, उन क्षेत्रों में मरीजों पर अपनी स्थिति को छिपाने (और उपचार ढूंढने से बचने) पर बाध्य किया जा सकता है, ताकि भेद-भाव से बचा जा सके. हैन्सेन के रोग के बारे में जागरुकता के अभाव के चलते लोग यह विश्वास (गलत ढंग से) कर सकते हैं कि यह बीमारी अत्यधिक संक्रामक और असाध्य है।
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कुष्ठरोग
इथियोपिया का अलर्ट (ALERT) अस्पताल और अनुसंधान केंद्र पूरे विश्व के चिकित्सा कर्मियों को कुष्ठरोग के उपचार का प्रशिक्षण प्रदान करता है और साथ ही अनेक स्थानीय मरीजों का उपचार भी करता है। शल्य-चिकित्सीय तकनीकें, जैसे अंगूठों की गतिविधि के नियंत्रण की पुनर्प्राप्ति के लिये, विकसित की जा चुकी हैं।
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कुष्ठरोग
1993 में कुष्ठरोग की कीमोथेरपी (Chemotherapy of Leprosy) पर डब्ल्यूएचओ (WHO) के अध्ययन-दल ने दो प्रकार के मानक एमडीटी (MDT) परहेज नियमों को अपनाए जाने की अनुशंसा की. पहला मल्टिबैसीलरी (multibacillary) (एमबी (MB) या लेप्रोमेटस) के मामलों के लिये राइफैम्पिसिन (rifampicin), क्लोफैज़िमाइन (clofazimine) और डैप्सोन (dapsone) के प्रयोग द्वारा 24-माह का एक उपचार था। दूसरा पॉसिबैसीलरी (paucibacillary) (पीबी (PB) or ट्युबरक्युलॉइड) के मामलों के लिये राइफैम्पिसिन (rifampicin) और डैप्सोन (dapsone) का प्रयोग करके छः माह का एक उपचार था। एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में कुष्ठरोग को मिटाने पर पहले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (First International Conference on the Elimination of Leprosy as a Public Health Problem), जो कि अगले वर्ष हनोई में आयोजित किया गया था, में वैश्विक रणनीति को प्रोत्साहन दिया गया और सभी स्थानिक देशों तक एमडीटी (MDT) का प्रबंध और आपूर्ति करने के लिये डब्ल्यूएचओ (WHO) को फंड प्रदान किया गया।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5
सारनाथ
इस स्तूप का ‘चौखंडी‘ नाम पुराना जान पड़ता है। इसके आकार-प्रकार से ज्ञात होता है कि एक चौकोर कुर्सी पर ठोस ईंटों की क्रमश: घटती हुई तीन मंज़िले बनाई गई थीं। सबसे ऊपर मंज़िल की खुली छत पर संभवत: कोई प्रतिमा स्थापित थी। गुप्तकाल में इस प्रकार के स्तूपों को ‘त्रिमेधि स्तूप’ कहते थे। उत्खनन से प्राप्त सामग्रियों के आधार पर यह निश्चित हो जाता है कि गुप्तकाल में इस स्तूप का निर्माण हो चुका था।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5
सारनाथ
इस स्तूप का निर्माण अशोक ने करवाया था। दुर्भाग्यवश 1794 ई. में जगत सिंह के आदमियों ने काशी का प्रसिद्ध मुहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था। खुदाई के समय 8.23 मी. की गहराई पर एक प्रस्तर पात्र के भीतर संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डिया: एवं सुवर्णपात्र, मोती के दाने एवं रत्न मिले थे, जिसे उन्होंने विशेष महत्त्व का न मानकर गंगा में प्रवाहित कर दिया। यहाँ से प्राप्त महीपाल के समय के 1026 ई. के एक लेख में यह उल्लेख है कि स्थिरपाल और बसंतपाल नामक दो बंधुओं ने धर्मराजिका और धर्मचक्र का जीर्णोद्धार किया।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5
सारनाथ
1907-08 ई. में मार्शल के निर्देशन में खुदाई से इस स्तूप के क्रमिक परिनिर्माणों के इतिहास का पता चला। इस स्तूप का कई बार परिवर्द्धन एवं संस्कार हुआ। इस स्तूप के मूल भाग का निर्माण अशोक ने करवाया था। उस समय इसका व्यास 13.48 मी. (44 फुट 3 इंच) था। इसमें प्रयुक्त कीलाकार ईंटों की माप 19 ½ इंच X 14 ½ इंच X 2 ½ इंच और 16 ½ इंच X 12 ½ इंच X 3 ½ इंच थी। सर्वप्रथम परिवर्द्धन कुषाण-काल या आरंभिक गुप्त-काल में हुआ। इस समय स्तूप में प्रयुक्त ईंटों की माप 17 इंच X10 ½ इंच X 2 ¾ ईच थी। दूसरा परिवर्द्धन हूणों के आक्रमण के पश्चात् पाँचवी या छठी शताब्दी में हुआ। इस समय इसके चारों ओर 16 फुट (4.6 मीटर) चौड़ा एक प्रदक्षिणा पथ जोड़ा गया। तीसरी बार स्तूप का परिवर्द्धन हर्ष के शासन-काल (7वीं सदी) में हुआ। उस समय स्तूप के गिरने के डर से प्रदक्षिणा पथ को ईंटों से भर दिया गया और स्तूप तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ लगा दी गईं। चौथा परिवर्द्धन बंगाल नरेश महीपाल ने महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण के दस वर्ष वाद कराया। अंतिम पुनरुद्धार लगभग 1114 ई. से 1154 ई. के मध्य हुआ। इसके पश्चात् मुसलमानों के आक्रमण ने सारनाथ को नष्ट कर दिया।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5
सारनाथ
उत्खनन से इस स्तूप से दो मूर्तियाँ मिलीं। ये मूर्तियाँ सारनाथ से प्राप्त मूर्तियों में मुख्य हैं। पहली मूर्ति कनिष्क के राज्य संवत्सर 3 (81 ई.) में स्थापित विशाल बोधिसत्व प्रतिमा और दूसरी धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में भगवान बुद्ध की मूर्ति। ये मूर्तियाँ सारनाथ की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियाँ हैं।
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सारनाथ
यह विहार धर्मराजिका स्तूप से उत्तर की ओर स्थित है। पूर्वाभिमुख इस विहार की कुर्सी चौकोर है जिसकी एक भुजा 18.29 मी. है। सातवीं शताब्दी में भारत-भ्रमण पर आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इसका वर्णन 200 फुट ऊँचे मूलगंध कुटी विहार के नाम से किया है। इस मंदिर पर बने हुए नक़्क़ाशीदार गोले और नतोदर ढलाई, छोटे-छोटे स्तंभों तथा सुदंर कलापूर्ण कटावों आदि से यह निश्चित हो जाता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल में हुआ था। परंतु इसके चारों ओर मिट्टी और चूने की बनी हुई पक्की फर्शों तथा दीवारो के बाहरी भाग में प्रयुक्त अस्त-व्यस्त नक़्क़ाशीदार पत्थरों के आधार पर कुछ विद्धानों ने इसे 8वीं शताब्दी के लगभग का माना है।
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सारनाथ
ऐसा प्रतीत होता है कि इस मंदिर के बीच में बने मंडप के नीचे प्रारंभ में भगवान बुद्ध की एक सोने की चमकीली आदमक़द मूर्ति स्थापित थी। मंदिर में प्रवेश के लिए तीनों दिशाओं में एक-एक द्वार और पूर्व दिशा में मुख्य प्रवेश द्वार (सिंह द्वार) था। कालांतर में जब मंदिर की छत कमज़ोर होने लगी तो उसकी सुरक्षा के लिए भीतरी दक्षिणापथ को दीवारें उठाकर बन्द कर दिया गया। अत: आने जाने का रास्ता केवल पूर्व के मुख्य द्वार से ही रह गया। तीनों दरवाजों के बंद हो जाने से ये कोठरियों जैसी हो गई, जिसे बाद में छोटे मंदिरों का रूप दे दिया गया। 1904 ई. में श्री ओरटल को खुदाई कराते समय दक्षिण वाली कोठरी में एकाश्मक पत्थर से निर्मित 9 ½ X 9 ½ फुट की मौर्यकालीन वेदिका मिली। इस वेदिका पर उस समय की चमकदार पालिश है। यह वेदिका प्रारम्भ में धर्मराजिका स्तूप के ऊपर हार्निका के चारों ओर लगी थीं। इस वेदिका पर कुषाणकालीन ब्राह्मी लिपि में दो लेख अंकित हैं- ‘आचाया(र्य्या)नाँ सर्वास्तिवादि नां परिग्रहेतावाम्’ और ‘आचार्यानां सर्वास्तिवादिनां परिग्राहे’। इन दोनों लेखों से यह ज्ञात होता है कि तीसरी शताब्दी ई. में यह वेदिका सर्वास्तिवादी संप्रदाय के आचार्यों को भेंट की गई थी।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5
सारनाथ
मुख्य मंदिर से पश्चिम की ओर एक अशोककालीन प्रस्तर-स्तंभ है जिसकी ऊँचाई प्रारंभ में 17.55 मी. (55 फुट) थी। वर्तमान समय में इसकी ऊँचाई केवल 2.03 मीटर (7 फुट 9 इंच) है। स्तंभ का ऊपरी सिरा अब सारनाथ संग्रहालय में है। नींव में खुदाई करते समय यह पता चला कि इसकी स्थापना 8 फुट X16 फुट X18 इंच आकार के बड़े पत्थर के चबूतरे पर हुई थी। इस स्तंभ पर तीन लेख उल्लिखित हैं। पहला लेख अशोक कालीन ब्राह्मी लिपि में है जिसमें सम्राट ने आदेश दिया है कि जो भिछु या भिक्षुणी संघ में फूट डालेंगे और संघ की निंदा करेंगे: उन्हें सफ़ेद कपड़े पहनाकर संघ के बाहर निकाल दिया जाएगा। दूसरा लेख कुषाण-काल का है। तीसरा लेख गुप्त काल का है, जिसमें सम्मितिय शाखा के आचार्यों का उल्लेख किया गया है।
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सारनाथ
यह स्तूप एक ठोस गोलाकार बुर्ज की भाँति है। इसका व्यास 28.35 मीटर (93 फुट) और ऊँचाई 39.01 मीटर (143 फुट) 11.20 मीटर तक इसका घेरा सुंदर अलंकृत शिलापट्टों से आच्छादित है। इसका यह आच्छादन कला की दृष्टि से अत्यंत सुंदर एवं आकर्षक है। अलंकरणों में मुख्य रूप से स्वस्तिक, नन्द्यावर्त सदृश विविध आकृतियाँ और फूल-पत्ती के कटाव की बेलें हैं। इस प्रकार के वल्लरी प्रधान अलंकरण बनाने में गुप्तकाल के शिल्पी पारंगत थे। इस स्तूप की नींव अशोक के समय में पड़ी। इसका विस्तार कुषाण-काल में हुआ, लेकिन गुप्तकाल में यह पूर्णत: तैयार हुआ। यह साक्ष्य पत्थरों की सजावट और उन पर गुप्त लिपि में अंकित चिन्हों से निश्चित होता है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5
सारनाथ
कनिंघम ने सर्वप्रथम इस स्तूप के मध्य खुदाई कराकर 0.91 मीटर (3 फुट) नीचे एक शिलापट्ट प्राप्त किया था। इस शिलापट्ट पर सातवीं शताब्दी की लिपि में ‘ये धर्महेतु प्रभवा’ मंच अंकित था। इस स्तूप में प्रयुक्त ईंटें 14 ½ इंच X 8 ½ इंच X 2 ¼ इंच आकार की हैं। धमेक (धमेख) शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों का मत है कि यह संस्कृत के ‘धर्मेज्ञा’ शब्द से निकला है। किंतु 11 वीं शताब्दी की एक मुद्रा पर ‘धमाक जयतु’ शब्द मिलता है। जिससे उसकी उत्पत्ति का ऊपर लिखे शब्द से संबंधित होना संदेहास्पद लगता है। इस मुद्रा में इस स्तूप को धमाक कहा गया है। इसे लोग बड़ी आदर की दृष्टि से देखते थे और इसकी पूजा करते थे। कनिंघम ने ‘धमेख’ शब्द को संस्कृत शब्द ‘धर्मोपदेशक’ का संक्षिप्त रूप स्वीकार किया है। उल्लेखनीय है कि बुद्ध ने सर्वप्रथम यहाँ ‘धर्मचक्र’ प्रारंभ किया था। अत: ऐसा संभव है कि इस कारण ही इसका नाम धमेख पड़ा हो।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
कंडोम को सहवास से पहले पुरुषों द्वारा अपने स्तंभित लिंग पर चढ़ाया जाता है। यह एक भौतिक बाधा प्रदान करता है जो वीर्य को पुरुष के यौन साथी के शरीर में पहुँचने से अवरोधित कर देता है। पुरुषों का कंडोम लेटेक्स ("रबड़" जैसा एक पदार्थ) या पॉलीयुरीथेन से बना होता है। यूरोप में ऐतिहासिक तौरपर (एवं कई स्थानों में अभी भी) भेंड की आंतों से कंडोम बनए जाते थे। यह आमतौर पर एक प्लास्टिक की थैली में लिपटे होते है। महिला निरोध की तुलना में पुरुष निरोध सुविधाजनक, सुलभ और दुष्परिणाम-मुक्त होते हैं। तथापि, लैटेक्स एलर्जी वाले पुरुषों को लैटेक्स के बजाय अन्य पदार्थों से बने कंडोम (जैसे पोलयूरिथेन कंडोम) का उपयोग करना चाहिए। यद्यपि पुरुष निरोध (जो केवल एक बार उपयोग के लिए बनाए गए होते हैं) सामान्यतः लैटेक्स से बने होते हैं परंतु महिला निरोध सामान्यतः पोलयूरिथेन से बने होते हैं और उन्हें एकाधिक बार उपयोग किया जा सकता है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
यौन संक्रमण से बचाव के तौरपर कंडोम जैसी युक्तियों का उल्लेख हमें मध्यकाल से ही मिलता है। यूरोप में १५६४ से कंडोम को संक्रमण सुरक्षा हेतु उपयोग किया जाता रहा है। रबर से बने कंडोम सं १८५५ से आने शुरू हुए तथा लैटेक्स कंडोम १९२० के दशक से उपलब्ध होने लगे। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं की सूची में भी सूचीबद्ध है। 2019 तक, विश्व स्तर पर संततिनिरोध का उपयोग करने वालों में से लगभग 21% लोग कंडोम का उपयोग करते हैं, अतः यह महिला नसबंदी (24%) के बाद संतति नियंत्रण का दूसरा दूसरा सबसे प्रचलित तरीका है। पूर्वी एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में कंडोम के उपयोग की दरें सबसे अधिक हैं। वैश्विक स्तर पर सालाना लगभग छह से नौ अरब कंडोम बेचे जाते हैं।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
कंडोम को तने हुऐ लिंग पर चढाया जाता है )। कंडोम का सही इस्तेमाल करने के लिए निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
कंडोम की थैली को मध्य भाग से न खोलें। इसे हमेशा एक छोर से ही खोलें। खोलने के लिए दांतो का इस्तेमाल कभी ना करें।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
कंडोम की नोक को तब तक दबाए रखें जब तक की वह पूरी तरह से लिंग पर चढ़ न जाए। यह जरुरी है कि कंडोम की नोक में हवा बिलकुल ना हो।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
कंडोम पर स्वयं चिकनाहट होती है, इस पर कोई भी अन्य तैल युक्त चिकनाहट निर्माण करने वाला पदार्थ (जैसे तेल या वैसलीन) का प्रयोग न करें, ऐसा करने से कंडोम की क्षमता खत्म हो सकती है। यदि आवश्यकता हो तो जल युक्त स्नेहक जैसे के वाई जैली का प्रओग इसे चिकनाने के लिए करें।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
वीर्य स्खलन के बाद (लिंग से सफेद शुक्र-द्रव्य निकलने के बाद) लिंग के तनाव समाप्त होने से पहले ही कंडोम को उतार देना चाहिए। उतारने के बाद कंडोम के खुले छोर पर कस कर गांठ लगा दें।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
पुराने या जाली विक्रेताओं के बनाये हुए कंडोम कभी ना खरीदें। ये एड्स या गर्भ रोकने में सक्षम नहीं हो सकते।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A7
निरोध
"Sheathing Cupid's Arrow: the Oldest Artificial Contraceptive May Be Ripe for a Makeover", The Economist February 2014
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A4%AE%E0%A5%8D
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
शकुंतला राजा दुष्यन्त की पत्नी थी जो भारत के सुप्रसिद्ध राजा भरत की माता और मेनका अप्सरा की कन्या थी। महाभारत में लिखा है कि शंकुतला का जन्म मेनका अप्सरा के गर्भ से हुआ था जो इसे वन में छोड़कर चली गई थी। वन में शंकुतों (पक्षियों) आदि ने हिंसक पशुओं से इसकी रक्षा की थी, इसी से इसका नाम शकुंतला पड़ा। वन में से इसे कण्व ऋषि उठा लाए थे और अपने आश्रम में रखकर कन्या के समान पालते थे।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A4%AE%E0%A5%8D
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
एक बार राजा दुष्यन्त अपने साथ कुछ सैनिकों को लेकर शिकार खेलने निकले और घूमते फिरते कण्व ऋषि के आश्रम में पहुँचे। ऋषि उस समय वहाँ उपस्थित नहीं थे; इससे युवती शकुन्तला ने ही राजा दुष्यंत का आतिथ्य सत्कार किया। उसी अवसर पर दोनों में प्रेम और फिर गंधर्व विवाह हो गया। मुनि जब लौटकर आए, तब यह जानकर बहुत प्रसन्न हुए कि शकुंतला का विवाह दुष्यंत से हो गया। शकुंतला उस समय गर्भवती हो चुकी थी। समय पाकर उसके गर्भ से बहुत ही बलवान्‌ और तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम 'भरत' रखा गया। कहते हैं, 'भारत' नाम 'भरत' के नाम पर ही पड़ा।
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अभिज्ञानशाकुन्तलम्
कुछ दिनों बाद शकुंतला अपने पुत्र को लेकर दुष्यन्त के दरबार में पहुँची। परन्तु शकुन्तला को बीच में दुर्वासा ऋषि का शाप मिल चुका था। राजा ने इसे बिल्कुल नहीं पहचाना और स्पष्ट कह दिया कि न तो मैं तुम्हें जानता हूँ और न तुम्हें अपने यहाँ आश्रय दे सकता हूँ। परंतु इसी अवसर पर एक आकाशवाणी हुई, जिससे राजा को विदित हुआ कि यह मेरी ही पत्नी है और यह पुत्र भी मेरा ही है। उन्हें कण्व मुनि के आश्रम की सब बातें स्मरण हो आईं और उन्होंने शकुंतला को अपनी प्रधान रानी बनाकर अपने यहाँ रख लिया।
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अभिज्ञानशाकुन्तलम्
‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में अनेक मार्मिक प्रसंगों को उल्लेख किया गया है। एक उस समय, जब दुष्यन्त और शकुन्तला का प्रथम मिलन होता है। दूसरा उस समय, जब कण्व शकुन्तला को अपने आश्रम से पतिगृह के लिए विदा करते हैं। उस समय तो स्वयं ऋषि कहते हैं कि मेरे जैसे ऋषि को अपनी पालिता कन्या में यह मोह है तो जिनकी औरस पुत्रियां पतिगृह के लिए विदा होती हैं उस समय उनकी क्या स्थिति होती होगी।
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अभिज्ञानशाकुन्तलम्
तीसरा प्रसंग है, शकुन्तला का दुष्यन्त की सभा में उपस्थित होना और दुष्यन्त को उसको पहचानने से इनकार करना। चौथा प्रसंग है उस समय का, जब मछुआरे को प्राप्त दुष्यन्त के नाम वाली अंगूठी उसको दिखाई जाती है। और पांचवां प्रसंग मारीचि महर्षि के आश्रम में दुष्यन्त-शकुन्तला के मिलन का।
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अभिज्ञानशाकुन्तलम्
शकुन्तला में कालिदास का सबसे बड़ा चमत्कार उसके ध्वन्यात्मक संकेतों में है। इसमें कवि को विलक्षण सफलता यह मिली है कि उसने कहीं भी कोई भी वस्तु निष्प्रयोजन नहीं कही। कोई भी पात्र, कोई भी कथोप-कथन, कोई भी घटना, कोई भी प्राकृतिक दृश्य निष्प्रयोजन नहीं है। सभी घटनाएं यह दृश्य आगे आने वाली घटनाओं का संकेत चमत्कारिक रीति से पहले ही दे देते हैं। नाटक के प्रारम्भ में ही ग्रीष्म-वर्णन करते हुए वन-वायु के पाटल की सुगंधि से मिलकर सुगंधित हो उठने और छाया में लेटते ही नींद आने लगने और दिवस का अन्त रमणीय होने के द्वारा नाटक की कथा-वस्तु की मोटे तौर पर सूचना दे दी गई है, जो क्रमशः पहले शकुन्तला और दुष्यन्त के मिलन, उसके बाद नींद-प्रभाव से शकुन्तला को भूल जाने और नाटक का अन्त सुखद होने की सूचक है। इसी प्रकार नाटक के प्रारम्भिक गीत में भ्रमरों द्वारा शिरीष के फूलों को ज़रा-ज़रा-सा चूमने से यह संकेत मिलता है कि दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन अल्पस्थायी होगा। जब राजा धनुष पर बाण चढ़ाए हरिण के पीछे दौड़े जा रहे हैं, तभी कुछ तपस्वी आकर रोकते हैं। कहते हैं-‘महाराज’ यह आश्रम का हरिण है, इस पर तीर न चलाना।’ यहां हरिण के अतिरिक्त शकुन्तला की ओर भी संकेत है, जो हरिण के समान ही भोली-भाली और असहाय है। ‘कहां तो हरिणों का अत्यन्त चंचल जीवन और कहां तुम्हारे वज्र के समान कठोर बाण !’ इससे भी शकुन्तला की असहायता और सरलता तथा राजा की निष्ठुरता का मर्मस्पर्शी संकेत किया गया है। जब दुष्यन्त और शकुन्तला का प्रेम कुछ और बढ़ने लगता है, तभी नेपथ्य से पुकार सुनाई पड़ती है कि ‘तपस्वियो, आश्रम के प्राणियों की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ। शिकारी राजा दुष्यन्त यहां आया हुआ है।’ इसमें भी दुष्यन्त के हाथों से शकुन्तला की रक्षा की ओर संकेत किया गया प्रतीत होता है, परन्तु यह संकेत किसी के भी कान में सुनाई नहीं दिया; शकुन्तला को किसी ने नहीं बचाया। इससे स्थिति की करुणाजनकता और भी अधिक बढ़ जाती है।
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अभिज्ञानशाकुन्तलम्
चौथे अंक के प्रारम्भिक भाग में कण्व के शिष्य ने प्रभात का वर्णन करते हुए सुख और दुःख के निरन्तर साथ लगे रहने का तथा प्रिय के वियोग में स्त्रियों के असह्य दुःख का जो उल्लेख किया है, वह दुष्यन्त द्वारा शकुन्तला का परित्याग किए जाने के लिए पहले से ही पृष्ठभूमि-सी बना देता है। पांचवें अंक में रानी हंसपदिका एक गीत गाती हैं, जिसमें राजा को उनकी मधुर-वृत्ति के लिए उलाहना दिया गया है। दुष्यन्त भी यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने हंसपदिका से एक ही बार प्रेम किया है। इससे कवि यह गम्भीर संकेत देता है कि भले ही शकुन्तला को दु्ष्यन्त ने दुर्वासा के शाप के कारण भूलकर छोड़ा, परन्तु एक बार प्यार करने के बाद रानियों की उपेक्षा करना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी। अन्य रानियां भी उसकी इस मधुकर-वृत्ति का शिकार थीं। हंसपादिका के इस गीत की पृष्ठभूमि में शकुन्तला के परित्याग की घटना और भी क्रूर और कठोर जान पड़ती है। इसी प्रकार के ध्वन्यात्मक संकेतों से कालिदास ने सातवें अंक में दुष्यन्त, शकुन्तला और उसके पुत्र के मिलने के लिए सुखद पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। इन्द्र राजा दुष्यन्त को अपूर्व सम्मान प्रदान करते हैं। उसके बाद हेमकूट पर्वत पर प्रजापति के आश्रम में पहुंचते ही राजा को अनुभव होने लगता है कि जैसे वह अमृत के सरोवर में स्नान कर रहे हों। इस प्रकार के संकेतों के बाद दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन और भी अधिक मनोहर हो उठता है।
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अभिज्ञानशाकुन्तलम्
‘‘यदि तुम युवावस्था के फूल प्रौढ़ावस्था के फल और अन्य ऐसी सामग्रियां एक ही स्थान पर खोजना चाहो जिनसे आत्मा प्रभावित होता हो, तृप्त होता हो और शान्ति पाता हो, अर्थात् यदि तुम स्वर्ग और मर्त्यलोक को एक ही स्थान पर देखना चाहते हो तो मेरे मुख से सहसा एक ही नाम निकल पड़ता है - शाकुन्तलम्, महान कवि कालिदास की एक अमर रचना !’’
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अभिज्ञानशाकुन्तलम्
इसका अर्थ है - काव्य के जितने भी प्रकार हैं उनमें नाटक विशेष सुन्दर होता है। नाटकों में भी काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से अभिज्ञान शाकुन्तलं का नाम सबसे ऊपर है। अभिज्ञान शाकुन्तलं का नाम सबसे ऊपर है। अभिज्ञान शाकुन्तलं में भी उसका चतुर्थ अंक और इस अंक में भी चौथा श्लोक तो बहुत ही रमणीय है।
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6,136.15101
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3
लेखाकरण
वस्तुओं और सम्पत्ति के खाते वास्तविक खाते कहलाते हैं। इन खातों को वास्तविक इसलिए कहा जाता है कि इनमें वर्णित वस्तुएं, विशेष सम्पत्ति के रूप में व्यापार में प्रयोग की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर इन्हें बेचकर व्यापारी अपनी पूंजी को धन के रूप में परिवर्तित कर सकता है। वास्तविक खाते आर्थिक चिट्ठे में सम्पत्ति की तरह दिखाये जाते हैं। जैसे मशीन, भवन, माल, यन्त्र, फर्नीचर, रोकड व बैंक आदि के वास्तविक खाते होते हैं।
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लेखाकरण
इन खातों को अवास्तविक खाते भी कहते हैं। व्यापार में अनेक खर्च की मदें, आय की मदें तथा लाभ अथवा हानि की मदें होती हैं। इन सबके लिए अलग-अलग खाते बनते हैं जिनको ‘नाममात्र’ के खाते कहते हैं। व्यक्तिगत अथवा वास्तविक खातों की तरह इनका कोई मूर्त आधार नहीं होता। उदाहरण के लिए वेतन, मजदूरी, कमीशन, ब्याज इत्यादि के खाते नाममात्र के खाते होते हैं।
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लेखाकरण
प्रत्येक लेनदेन के दो पक्ष होते हैं। ऋणी या डेबिट पक्ष और धनी या क्रेडिट पक्ष। इस कारण उसका लेखा लिखने के लिए प्रत्येक खाते के दो भाग होते हैं। बायें हाथ की ओर भाग ‘ऋणी पक्ष’ (डेबिट साइड) होता है और दाहिने हाथ की ओर का भाग ‘धनी पक्ष’ (क्रेडिट साइड) होता है।
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लेखाकरण
खातों को डेबिट या क्रेडिट करना - जब किसी लेन-देन में कोई खाता ‘लेन’ पक्ष होता है अर्थात् उसको लाभ प्राप्त होता है तब उस खातो को डेबिट किया जाता है। डेबिट करने का मतलब यह है कि खाते के ऋणी (डेबिट) भाग (बांये हाथ वाले भाग) में लेनदेन का लेखा होगा। इसी प्रकार जब कोई खाता लेनदेन में देन पक्ष होता है अर्थात् उसके द्वारा कुछ लाभ किसी को होता है, तब उस खाते को क्रेडिट किया जाता है। अर्थात् उस खाते के क्रेडिट भाग में लेनदेन का लेखा किया जाएगा। प्रत्येक लेनदेन में इस तरह एक खाता (डेबिट) तथा दूसरा खाता क्रेडिट किया जाता है। डेबिट (डेबिट) खाते में डेबिट की ओर लेखा तथा क्रेडिट खाते में क्रेडिट की ओर लेखा होता है। क्रेडिट तथा डेबिट लेखा दोहरे लेखे की प्रणाली के अनुसार प्रत्येक लेनदेन के लिए किया जाता है।
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लेखाकरण
उदाहरण - यदि हमने मोहन से 100 रूपये का माल खरीदा है तो इसमें दो खाते हुए- एक माल का दूसरा मोहन का। एक लेखा पाने वाले खाते अर्थात् माल खाते (goods account) में किया जाएगा और दूसरा देने वाले खाते अर्थात मोहन के खाते में किया जाएगा।
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लेखाकरण
इसी कारण इस प्रणाली को दोहरे लेखे की प्रणाली कहा गया है। प्रत्येक लेनदेन में दो लेखे एक डेबिट (डेबिट) और एक क्रेडिट होता है।
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20231101.hi_194046_70
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3
लेखाकरण
1. सामान्यतः स्वीकृत लेखांकन सिद्धान्त : वित्तीय विवरण सामान्यतः स्वीकृत लेखांकन सिद्धान्त के अनुसार तैयार किये जाने चाहिए ताकि इनसे अन्तः अवधि तथा अन्तः कर्म की तुलना की जा सके।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3
लेखाकरण
2. लेखांकन सिद्धान्त - किसी व्यवस्था या कार्य के नियंत्रण हेतु प्रतिपादित कोई विचार जिसे व्यावसायिक वर्ग के सदस्यों द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। ये मनुष्य द्वारा निर्मित हैं। रसायन एवं भौतिक विज्ञान की तरह सार्वभौमिक नहीं है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3
लेखाकरण
3. लेखाशास्त्र के सिद्धान्त सामान्य रूप से तभी स्वीकृत होते है जब उनमें तीन लक्षण विद्यमान हों, ये हैं - सम्बद्धता, वस्तु परकता एवं सुगमता
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20231101.hi_1761_4
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%87
पुणे
आठवी शताब्दी मे पुणे को "पुन्नक " नाम से जाना जाता था। शहर का सबसे पुराना वर्णन ई.स. 758 का है, जब उस काल के राष्ट्रकूट राज मे इसका उल्लेख मिलता है। मध्ययुग काल का एक प्रमाण जंगली महाराज मार्ग पर पाई जाने वाली पातालेश्वर गुफा है, जो आठ्वी सदी की मानी जाती है। 17वीं शताब्दी मे यह शहर निजामशाही, आदिलशाही, मुगल ऐसे विभिन्न राजवंशो का अंग रहा। सतरहवी शताब्दी में शहाजीराजे भोसले को निजामशाहा ने पुणे की जमीनदारी दी थी। इस जमींदारी मे उनकी पत्नी जिजाबाई ने ई.स. 1627 में शिवनेरी किले पर छत्रपति शिवाजीराजे भोसले को जन्म दिया। शिवाजी महाराज ने अपने साथियों के साथ पुणे परिसर में मराठा साम्राज्य की स्थापना की। इस काल मे पुणे में शिवाजी महाराज का वर्चस्व था। आगे पेशवा के काल मे ई.स. 1749 सातारा को छत्रपति की गद्दी और राजधानी बना कर पुणे को मराठा साम्राज्य की 'प्रशासकीय राजधानी' बना दी गई। पेशवा के काल मे पुणे की काफी तरक्की हुई। ई.स. 1818 तक पुणे मे मराठों का राज्य था।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%87
पुणे
पुणे छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन व मराठा साम्राज्य के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अंग है। ई.स. 1635-36 के दरमयान जब जिजाबाई व शिवाजी महाराज पुणे आवास के लिए आए, तबसे पुणे के इतिहास में एक नए पर्व का जन्म हुआ। शिवाजी महाराज व जिजामाता पुणे में लाल महल मे रहते थे। पुणे के ग्रामदेवता- कसबा गणपती की स्थापना जिजाबाई ने की थी।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%87
पुणे
17वीं शतब्दी के प्रारम्भ में, छत्रपती शाहू के प्रधानमन्त्री, थोरले बाजीराव पेशवे को पुणे को अपना स्थाई आवास बनाना था। छत्रपति शाह महाराज ने इसकी अनुमति दी व पेशवा ने मुठा नदी के किनारे शनिवार वाड़ा बनाया।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%87
पुणे
खरडा इस ऐतिहासिक किले पर मराठों एवं निज़ाम के बीच ई.स. 1795 के बीच युध्द हुआ। ई.स. 1817 को पुणे के पास खडकी ब्रिटिश व मराठों में युध्द हुआ। मराठो को इस युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ा व ब्रिटिश ने पुणे को अपने कबजे में कर लिया। ब्रिटिश ने पुणे के महत्व को समझते हुए शहर के पूर्व मे खडकी कँटोन्मेंट (लष्कर छावनी) की स्थापना की। ई.स. 1858 में पुणे महानगरपालिका की स्थापना हुई। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पुणे मे अनेक नामांकित शिक्षण संस्थाओ की स्थापना हुई।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%87
पुणे
भारतीय स्वातन्त्रा संग्राम में पुणे के नेताओं और समाज सुधारकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। महात्मा ज्योतिबा फुले और सावरकर जैसे नेताओं के कारण पुणे राष्ट्र के नक्शे पर अपने महत्व को दर्शाता रहा। महादेव गोविन्द रानडे, रा.ग. भाण्डारकर, विठ्ठल रामजी शिन्दे, गोपाल कृष्ण गोखले, लोखण्डे जैसे समाजसुधारक व राष्ट्रीय ख्याती के नेता पुणे से थे।
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