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20231101.hi_3269_27
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ब्राज़ील
2007 में, नेशनल इंडियन फाउंडेशन ने अनुमान लगाया था कि ब्राजील में 67 अलग-अलग असंबद्ध जनजातियां हैं, जो 2005 में 40 के अनुमान से ज्यादा थीं। ब्राजील में दुनिया में सबसे ज्यादा असंबद्ध लोगों की संख्या है।
0.5
5,960.665349
20231101.hi_3269_28
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ब्राज़ील
देश का मुख्य धर्म रोमन कैथोलिक है। ब्राजील में दुनिया की सबसे बड़ी कैथोलिक आबादी है। 2000 जनसांख्यिकीय जनगणना के अनुसार (पीएनएडी सर्वेक्षण धर्म के बारे में पूछताछ नहीं करता है), 73.57% आबादी रोमन कैथोलिक धर्म का पालन करती है; 15.41% प्रोटेस्टेंटिज्म; 1.33% कार्डेसिस्ट भावनावाद; 1.22% अन्य ईसाई संप्रदाय; 0.31% अफ्रीका-ब्राजील के धर्म; 0.13% बौद्ध धर्म; 0.05% यहूदी धर्म; 0.02% इस्लाम; 0.01% आदिवासी धर्म; 0.5 9% अन्य धर्म, अविकसित या अनिश्चित; जबकि 7.35% का कोई धर्म नहीं है।
0.5
5,960.665349
20231101.hi_3269_29
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ब्राज़ील
पुर्तगाली साम्राज्य के साथ अपने मजबूत औपनिवेशिक संबंधों के कारण ब्राजील की मूल संस्कृति पुर्तगाली संस्कृति काफी प्रभावित है। अन्य प्रभावों में, पुर्तगाली ने पुर्तगाली भाषा, रोमन कैथोलिक धर्म और औपनिवेशिक वास्तुशिल्प शैलियों की शुरुआत की। हालांकि, संस्कृति अफ्रीकी, स्वदेशी और गैर-पुर्तगाली यूरोपीय संस्कृतियों और परंपराओं से भी काफी प्रभावित है।
0.5
5,960.665349
20231101.hi_15239_10
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF
महाकाव्य
(1) महाकाव्य की कथावस्तु एक ओर शुद्ध ऐतिहासिक यथार्थ से भिन्न होती है ओर दूसरी ओर सर्वथा काल्पनिक भी नहीं होती। वह प्रख्यात (जातीय दंतकथाओं पर आश्रित) होनी चाहिए और उसमें यथार्थ से भव्यतर जीवन का अंकन होना चाहिए।
0.5
5,941.652309
20231101.hi_15239_11
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महाकाव्य
(2) उसका आयाम विस्तृत होना चाहिए जिसके अंतर्गत विविध उपाख्यानों का समावेश हो सके। "उसमें अपनी सीमाओं का विस्तार करने की बड़ी क्षमता होती है" क्योंकि त्रासदी की भांति वह रंगमंच की देशकाल संबंधी सीमाओं में परिबद्ध नहीं होता। उसमें अनेक घटनाओं का सहज समावेश हो सकता है जिससे एक ओर काव्य को घनत्व और गरिमा प्राप्त होती है और दूसरी ओर अनेक उपाख्यानों के नियोजन के कारण रोचक वैविध्य उत्पन्न हो जाता है।
0.5
5,941.652309
20231101.hi_15239_12
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महाकाव्य
(3) किंतु कथानक का यह विस्तार अनियंत्रित नहीं होना चाहिए। उसमें एक ही कार्य होना चाहिए जो आदि मध्य अवसान से युक्त एवं स्वत: पूर्ण हो। समस्त उपाख्यान इसी प्रमुख कार्य के साथ संबंद्ध और इस प्रकार से गुंफित हों कि उनका परिणाम एक ही हो।
0.5
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महाकाव्य
(4) इसके अतिरिक्त त्रासदी के वस्तुसंगठन के अन्य गुण -- पूर्वापरक्रम, संभाव्यता तथा कुतूहल—भी महाकाव्य में यथावत् विद्यमान रहते हैं। उसकी परिधि में अद्भुत एवं अतिप्राकृत तत्त्व के लिये अधिक अवकाश रहता है और कुतूहल की संभावना भी महाकाव्य में अपेक्षाकृत अधिक रहती है। कथानक के सभी कुतूहलवर्धक अंग, जैसे स्थितिविपर्यय, अभिज्ञान, संवृति और विवृति, महाकाव्य का भी उत्कर्ष करते हैं।
0.5
5,941.652309
20231101.hi_15239_14
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महाकाव्य
महाकाव्य के पात्रों के सम्बंध में अरस्तू ने केवल इतना कहा है कि "महाकाव्य और त्रासदी में यह समानता है कि उसमें भी उच्चतर कोटि के पात्रों की पद्यबद्ध अनुकृति रहती है।" त्रासदी के पात्रों से समानता के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं कि महाकाव्य के पात्र भी प्राय: त्रासदी के समान - भद्र, वैभवशाली, कुलीन और यशस्वी होने चाहिए। रुद्रट के अनुसार महाकाव्य में प्रतिनायक और उसके कुल का भी वर्णन होता है।
1
5,941.652309
20231101.hi_15239_15
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महाकाव्य
अरस्तू के अनुसार महाकाव्य का प्रभाव और प्रयोजन भी त्रासदी के समान होना चाहिए, अर्थात् मनोवेगों का विरेचन, उसका प्रयोजन और तज्जन्य मन:शांति उसका प्रभाव होना चाहिए। यह प्रभाव नैतिक अथवा रागात्मक अथवा दोनों प्रकार का हो सकता है।
0.5
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महाकाव्य
अरस्तू के शब्दों में महाकाव्य की शैली का भी "पूर्ण उत्कर्ष यह है कि वह प्रसन्न (प्रसादगुण युक्त) हो किंतु क्षुद्र न हो।" अर्थात् गरिमा तथा प्रसादगुण महाकाव्य की शैली के मूल तत्त्व हैं और गरिमा का आधार है असाधारणता। उनके मतानुसार महाकाव्य की भाषाशैली त्रासदी की करुणमधुर अलंकृत शैली से भिन्न, लोकातिक्रांत प्रयोगों से कलात्मक, उदात्त एवं गरिमावरिष्ठ होनी चाहिए।
0.5
5,941.652309
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महाकाव्य
महाकाव्य की रचना के लिये वे आदि से अंत तक एक ही छंद - वीर छंद - के प्रयोग पर बल देते हैं क्योंकि उसका रूप अन्य वृत्तों की अपेक्षा अधिक भव्य एवं गरिमामय होता है जिसमें अप्रचलित एवं लाक्षणिक शब्द बड़ी सरलता से अंतर्भुक्त हो जाते हैं। परवर्ती विद्वानों ने भी महाकाव्य के विभिन्न तत्वों के संदर्भ में उन्हीं विशेषताओं का पुनराख्यान किया है जिनका उल्लेख आचार्य अरस्तू कर चुके थे। वीरकाव्य (महाकाव्य) का आधार सभी ने जातीय गौरव की पुराकथाओं को स्वीकार किया है। जॉन हेरिंगटन वीरकाव्य के लिये ऐतिहासिक आधारभूमि की आवश्यकता पर बल देते हैं और स्पेंसर वीरकाव्य के लिये वैभव और गरिमा को आधारभूत तत्त्व मानते हैं। फ्रांस के कवि आलोचकों पैलेतिए, वोकलें और रोनसार आदि ने भी महाकाव्य की कथावस्तु को सर्वाधिक गरिमायम, भव्य और उदात्त करते हुए उसके अंतर्गत ऐसे वातावरण के निर्माण का आग्रह किया है जो क्षुद्र घटनाओं से मुक्त एवं भव्य हो।
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महाकाव्य
भारतीय और पाश्चात्य आलोचकों के उपर्युक्त निरूपण की तुलना करने पर स्पष्ट हो जाता है कि दोनों में ही महाकाव्य के विभिन्न तत्वों के संदर्भ में एक ही गुण पर बार-बार शब्दभेद से बल दिया गया है और वह है - भव्यता एवं गरिमा, जो औदात्य के अंग हैं। वास्तव में, महाकाव्य व्यक्ति की चेतना से अनुप्राणित न होकर समस्त युग एवं राष्ट्र की चेतना से अनुप्राणित होता है। इसी कारण उसके मूल तत्त्व देशकाल सापेक्ष न होकर सार्वभौम होते हैं -- जिनके अभाव में किसी भी देश अथवा युग की कोई रचना महाकाव्य नहीं बन सकती और जिनके सद्भाव में, परंपरागत शास्त्रीय लक्षणों की बाधा होने पर भी, किसी कृति को महाकाव्य के गौरव से वंचित करना संभव नहीं होता। ये मूल तत्त्व हैं -
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5,941.652309
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पद्मावत
इसकी रचना सन् 947 हिजरी. (संवत् 1540) में हुई थी। इसकी कुछ प्रतियों में रचनातिथि 927 हि. मिलती है, किंतु वह असंभव है। अन्य कारणों के अतिरिक्त इस असंभावना का सबसे बड़ा कारण यह है कि मलिक साहब का जन्म ही 900 या 906 हिजरी में हुआ था। ग्रंथ के प्रारंभ में शाहेवक्त के रूप में शेरशाह की प्रशंसा है, यह तथ्य भी 947 हि. को ही रचनातिथि प्रमाणित करता है। 927 हि. में शेरशाह का इतिहास में कोई स्थान नहीं था।
0.5
5,923.838695
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पद्मावत
जायसी सूफी संत थे और इस रचना में उन्होंने नायक रतनसेन और नायिका पद्मिनी की प्रेमकथा को विस्तारपूर्वक कहते हुए प्रेम की साधना का संदेश दिया है। रतनसेन ऐतिहासिक व्यक्ति है, वह चित्तौड़ का राजा है, पद्मावती उसकी वह रानी है जिसके सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर तत्कालीन सुल्तान अलाउद्दीन उसे प्राप्त करने के लिये चित्तौड़ पर आक्रमण करता है और यद्यपि युद्ध में विजय प्राप्त करता है तथापि पद्मावती के जल थझररने के कारण उसे नहीं प्राप्त कर पाता है। इसी अर्ध ऐतिहासिक कथा के पूर्व रतनसेन द्वारा पदमावती के प्राप्त किए जाने की व्यवस्था जोड़ी गई है, जिसका आधार अवधी क्षेत्र में प्रचलित हीरामन सुग्गे की एक लोककथा है। कथा संक्षेप में इस प्रकार है :
0.5
5,923.838695
20231101.hi_97592_4
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पद्मावत
सिंहल द्वीप (श्रीलंका) का राजा गंधर्वसेन था, जिसकी कन्या पदमावती थी, जो पद्मिनी थी। उसने एक सुग्गा पाल रखा था, जिसका नाम हीरामन था। एक दिन पदमावती की अनुपस्थिति में बिल्ली के आक्रमण से बचकर वह सुग्गा भाग निकला और एक बहिलिए के द्वारा फँसा लिया गया। उस बहेलिए से उसे एक ब्राह्मण ने मोल ले लिया, जिसने चित्तौड़ आकर उसे वहाँ के राजा रतनसिंह राजपूत के हाथ बेच दिया। इसी सुग्गे से राजा ने पद्मिनी (पदमावती) के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन सुना, तो उसे प्राप्त करन के लिये योगी बनकर निकल पड़ा।अनेक वनों और समुद्रों को पार करके वह सिंहल पहुँचा। उसके साथ में वह सुग्गा भी था। सुग्गे के द्वारा उसने पदमावती के पास अपना प्रेमसंदेश भेजा। पदमावती जब उससे मिलने के लिये एक देवालय में आई, उसको देखकर वह मूर्छित हो गया और पदमावती उसको अचेत छोड़कर चली गई। चेत में आने पर रतनसेन बहुत दु:खी हुआ। जाते समय पदमावती ने उसके हृदय पर चंदन से यह लिख दिया था कि उसे वह तब पा सकेगा जब वह सात आकाशों (जैसे ऊँचे) सिंहलगढ़ पर चढ़कर आएगा। अत: उसने सुग्गे के बताए हुए गुप्त मार्ग से सिंहलगढ़ के भीतर प्रवेश किया। राजा को जब यह सूचना मिली तो उसने रतनसेन को शूली देने का आदेश दिया किंतु जब हीरामन से रतनसिंह राजपूत के बारे में उसे यथार्थ तथ्य ज्ञात हुआ, उसने पदमावती का विवाह उसके साथ कर दिया।
0.5
5,923.838695
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पद्मावत
रतनसिंह पहले से ही विवाहित था और उसकी उस विवाहिता रानी का नाम नागमती था। रतनसेन के विरह में उसने बारह महीने कष्ट झेल कर किसी प्रकार एक पक्षी के द्वारा अपनी विरहगाथा रतनसिंह के पास भिजवाई और इस विरहगाथा से द्रवित होकर रतनसिंह पदमावती को लेकर चित्तौड़ लौट आया।
0.5
5,923.838695
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पद्मावत
यहाँ, उसकी सभा में राघव नाम का एक तांत्रिक था, जो असत्य भाषण के कारण रतनसिंह द्वारा निष्कासित होकर तत्कालीन सुल्तान अलाउद्दीन की सेवा में जा पहुँचा और जिसने उससे पदमावती के सौंदर्य की बड़ी प्रशंसा की। अलाउद्दीन पदमावती के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन सुनकर उसको प्राप्त करने के लिये लालायित हो उठा और उसने इसी उद्देश्य से चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। दीर्घ काल तक उसने चित्तौड़ पर घेरा डाल रखा, किंतु कोई सफलता होती उसे न दिखाई पड़ी, इसलिये उसने धोखे से रतनसिंह राजपूत को बंदी करने का उपाय किया। उसने उसके पास संधि का संदेश भेजा, जिसे रतन सिंह ने स्वीकार कर अलाउद्दीन को विदा करने के लिये गढ़ के बाहर निकला, अलाउद्दीन ने उसे बंदी कर दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया।
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5,923.838695
20231101.hi_97592_7
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पद्मावत
चित्तौड़ में पदमावती अत्यंत दु:खी हुई और अपने पति को मुक्त कराने के लिये वह अपने सामंतों गोरा तथा बादल के घर गई। गोरा बादल ने रतनसिह को मुक्त कराने का बीड़ा लिया। उन्होंने सोलह सौ डोलियाँ सजाईं जिनके भीतर राजपूत सैनिकों को रखा और दिल्ली की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने यह कहलाया कि पद्मावती अपनी चेरियों के साथ सुल्तान की सेवा में आई है और अंतिम बार अपने पति रतनसेन से मिलने के लिय आज्ञा चाहती है। सुल्तान ने आज्ञा दे दी। डोलियों में बैठे हुए राजपूतों ने रतनसिंह को बेड़ियों से मुक्त किया और वे उसे लेकर निकल भागे। सुल्तानी सेना ने उनका पीछा किया, किंतु रतन सिंह सुरक्षित रूप में चित्तौड़ पहुँच ही गया।
0.5
5,923.838695
20231101.hi_97592_8
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पद्मावत
जिस समय वह दिल्ली में बंदी था, कुंभलनेर के राजा देवपाल ने पदमावती के पास एक दूत भेजकर उससे प्रेमप्रस्ताव किया था। रतन सिंह से मिलने पर जब पदमावती ने उसे यह घटना सुनाई, वह चित्तौड़ से निकल पड़ा और कुंभलनेर जा पहुँचा। वहाँ उसने देवपाल को द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारा। उस युद्ध में वह देवपाल की सेल से बुरी तरह आहत हुआ और यद्यपि वह उसको मारकर चित्तौड़ लौटा किंतु देवपाल की सेल के घाव से घर पहुँचते ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। पदमावती और नागमती ने उसके शव के साथ चितारोहण किया। अलाउद्दीन भी रतनसिंह राजपूत का पीछा करता हुआ चित्तौड़ पहुँचा, किंतु उसे पदमावती न मिलकर उसकी चिता की राख ही मिली।
0.5
5,923.838695
20231101.hi_97592_9
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पद्मावत
इस कथा में जायसी ने इतिहास और कल्पना, लौकिक और अलौकिक का ऐसा सुंदर सम्मिश्रण किया है कि हिंदी साहित्य में दूसरी कथा इन गुणों में "पदमावत" की ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकी है। प्राय: यह विवाद रहा है कि इसमें कवि ने किसी रूपक को भी निभाने का यत्न किया है। रचना के कुछ संस्करणों में एक छंद भी आता है, जिसमें संपूर्ण कथा को एक आध्यात्मिक रूपक बताया गया है और कहा गया है कि चित्तौड़ मानव का शरीर है, राजा उसका मन है, सिंहल उसका हृदय है, पदमिनी उसकी बुद्धि है, सुग्गा उसका गुरु है, नागमती उसका लौकिक जीवन है, राघव शैतान है और अलाउद्दीन माया है; इस प्रकार कथा का अर्थ समझना चाहिए। किंतु यह छंद रचना की कुछ ही प्रतियों में मिलता है और वे प्रतियाँ भी ऐसी ही हैं जो रचना की पाठपरंपरा में बहुत नीचे आती है। इसके अतिरिक्त यह कुंजी रचना भर में हर जगह काम भी नहीं देती है : उदाहरणार्थ गुरु-चेला-संबंध सुग्गे और रतनसेन में ही नहीं है, वह रचना के भिन्न भिन्न प्रसंगों में रतनसेन-पदमावती, पदमावती-रतनसेन और रतनसेन तथा उसके साथ के उन कुमारों के बीच भी कहा गया है जो उसके साथ सिंहल जाते हैं। वस्तुत: इसी से नहीं, इस प्रकार की किसी कुंजी के द्वारा भी कठिनाई हल नहीं होती है और उसका कारण यही है कि किसी रूपक के निर्वाह का पूरी रचना में यत्न किया ही नहीं गया है। जायसी का अभीष्ट केवल प्रेम का निरूपण करना ज्ञात होता है। वे स्थूल रूप में प्रेम के दो चित्र प्रस्तुत-करते हैं : एक तो वह जो आध्यात्मिक साधन के रूप में आता है, जिसके लिये प्राणों का उत्सर्ग भी हँसते हँसते किया जा सकता है; रतनसेन और पदमावती का प्रेम इसी प्रकार का है : रतनसेन पदमावती को पाने के लिये सिंहलगढ़ में प्रवेश करता है और शूली पर चढ़ने के लिये हँसते हँसते आगे बढ़ता है; पदमावती रतनसेन के शव के साथ हँसते हँसते चितारोहण करती है और अलाउद्दीन जैसे महान सुल्तान की प्रेयसी बनने का लोभ भी अस्वीकार कर देती है। दूसरा प्रेम वह है जो अलाउद्दीन पदमावती से करता है। दूसरे की विवाहिता पत्नी को वह अपने भौतिक बल से प्राप्त करना चाहता है। किंतु जायसी प्रथम प्रकार के प्रेम की विजय और दूसरे प्रकार के प्रेम की पराजय दिखाते हैं। दूसरा उनकी दृष्टि में हेय और केवल वासना है; प्रेम पहला ही है। जायसी इस प्रेम को दिव्य कहते हैं।
0.5
5,923.838695
20231101.hi_97592_10
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4
पद्मावत
पद्मावत में उपसंहार समेत ५८ अध्याय हैं। इनके नाम हैं- स्तुति खंड, सिंहलद्वीप वर्णन खंड, जन्म खंड, मानसरोदक खंड, सुआ खंड, रत्नसेन जन्म खंड, बनिजारा खंड,
0.5
5,923.838695
20231101.hi_63109_0
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6
पलाश
पलाश (पलास,छूल,परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू) एक वृक्ष है जिसके फूल बहुत ही आकर्षक होते हैं। इसके आकर्षक फूलों के कारण इसे "जंगल की आग" भी कहा जाता है। पलाश का फूल उत्तर प्रदेश और झारखण्ड का राज्य पुष्प है और इसको 'भारतीय डाकतार विभाग' द्वारा डाक टिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित किया जा चुका है। प्राचीन काल से ही होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है। भारत भर मे इसे जाना जाता है। एक "लता पलाश" भी होता है। लता पलाश दो प्रकार का होता है। एक तो लाल पुष्पो वाला और दूसरा सफेद पुष्पो वाला। लाल फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम "ब्यूटिया मोनोस्पर्मा" है। सफेद पुष्पो वाले लता पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। वैज्ञानिक दस्तावेज़ों में दोनो ही प्रकार के लता पलाश का वर्णन मिलता है। सफेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम "ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा" है जबकि लाल फूलो वाले को "ब्यूटिया सुपर्बा" कहा जाता है। एक पीले पुष्पों वाला पलाश भी होता है। इसका उपयोग तांत्रिक गति-विधियों में भी बहुतायत से किया जाता है।
0.5
5,917.010333
20231101.hi_63109_1
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6
पलाश
पलाश की पत्तियों का उपयोग वैवाहिक कार्यक्रमों मे मंडपाच्छादन के लिए और मेहमानों को भोजन कराने के लिए दोना पत्तल के रूप मेें बहुत प्रचलित था,यह गांव मे सस्ते इंधन का विकल्प है और जलाऊ लकड़ी के रूप मेें उपयोग होता है। पलाश के फूलों का रस तितली, मधुमक्खियों बंदरों के अलावा बच्चों को भी बहुत मधुर लगता है। इसके फूलों के गहने बच्चों को बहुत भाते हैं। छत्तीसगढ़ ये की लोकप्रिय गीत इन फूलों पर बनाते और फिल्माए गए हैं जैसे ,रस घोले ये माघ फगुनवा,मन डोले रे माघ फगुनवा,राजा बरोबर लगे मौरे आमा रानी सही परसा फुलवा ।
0.5
5,917.010333
20231101.hi_63109_2
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6
पलाश
पलास भारतवर्ष के सभी प्रदेशों और सभी स्थानों में पाया जाता है। पलास का वृक्ष मैदानों और जंगलों ही में नहीं, ४००० फुट ऊँची पहाड़ियों की चोटियों तक पर किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है। यह तीन रूपों में पाया जाता है—वृक्ष रूप में, क्षुप रूप में और लता रूप में। बगीचों में यह वृक्ष रूप में और जंगलों और पहाड़ों में अधिकतर क्षुप रूप में पाया जाता है। लता रूप में यह कम मिलता है। पत्ते, फूल और फल तीनों भेदों के समान ही होते हैं। वृक्ष बहुत ऊँचा नहीं होता, मझोले आकार का होता है। क्षुप झाड़ियों के रूप में अर्थात् एक स्थान पर पास पास बहुत से उगते हैं। पत्ते इसके गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं जिनका रंग पीठ की ओर सफेद और सामने की ओर हरा होता है। पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन तीन होते हैं। इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है। लकड़ी बड़ी टेढ़ी मेढ़ी होती है। कठिनाई से चार पाँच हाथ सीधी मिलती है। इसका फूल छोटा, अर्धचंद्राकार और गहरा लाल होता है। फूल को प्रायः टेसू कहते हैं और उसके गहरे लाल होने के कारण अन्य गहरी लाल वस्तुओं को 'लाल टेसू' कह देते हैं। फूल फागुन के अंत और चैत के आरंभ में लगते हैं। उस समय पत्ते तो सबके सब झड़ जाते हैं और पेड़ फूलों से लद जाता है जो देखने में बहुत ही भला मालूम होता है। फूल झड़ जाने पर चौड़ी चौ़ड़ी फलियाँ लगती है जिनमें गोल और चिपटे बीज होते हैं। फलियों को 'पलास पापड़ा' या 'पलास पापड़ी' और बीजों को 'पलास-बीज' कहते हैं।
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पलाश
पलास के पत्ते प्रायः पत्तल और दोने आदि के बनाने के काम आते हैं। राजस्थान और बंगाल में इनसे तंबाकू की बीड़ियाँ भी बनाते हैं। फूल और बीज ओषधिरूप में प्रयोग होते हैं। पलाश के बीज में पेट के कीड़े मारने का गुण विशेष रूप से निहित होता है। फूल को उबालने से एक प्रकार का ललाई लिए हुए पीला रंग भी निकलता है जिसका खासकर होली के अवसर पर प्रयोग किया जाता है। फली की बुकनी कर लेने से वह भी अबीर का काम देती है। छाल से एक प्रकार का रेशा निकलता है जिसको जहाज के पटरों की दरारों में भरकर भीतर पानी आने की रोक की जाती है। जड़ की छाल से जो रेशा निकलता है उसकी रस्सियाँ बटी जाती हैं। दरी और कागज भी इससे बनाया जाता है। इसकी पतली डालियों को उबालकर एक प्रकार का कत्था तैयार किया जाता है जो कुछ घटिया होता है और बंगाल में अधिक खाया जाता है। मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार करते हैं। छाल पर बछने लगाने से एक प्रकार का गोंद भी निकलता है जिसको 'चुनियाँ गोंद' या पलास का गोंद कहते हैं। वैद्यक में इसके फूल को स्वादु, कड़वा, गरम, कसैला, वातवर्धक शीतज, चरपरा, मलरोधक तृषा, दाह, पित्त कफ, रुधिरविकार, कुष्ठ और मूत्रकृच्छ का नाशक; फल को रूखा, हलका गरम, पाक में चरपरा, कफ, वात, उदररोग, कृमि, कुष्ठ, गुल्म, प्रमेह, बवासीर और शूल का नाशक; बीज को स्तिग्ध, चरपरा गरम, कफ और कृमि का नाशक और गोंद को मलरोधक, ग्रहणी, मुखरोग, खाँसी और पसीने को दूर करनेवाला लिखा है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6
पलाश
यह वृक्ष हिंदुओं के पवित्र माने हुए वृक्षों में से हैं। इसका उल्लेख वेदों तक में मिलता है। श्रोत्रसूत्रों में कई यज्ञपात्रों के इसी की लकड़ी से बनाने की विधि है। गृह्वासूत्र के अनुसार उपनयन के समय में ब्राह्मणकुमार को इसी की लकड़ी का दंड ग्रहण करने की विधि है। वसंत में इसका पत्रहीन पर लाल फूलों से लदा हुआ वृक्ष अत्यंत नेत्रसुखद होता है। संस्कृत और हिंदी के कवियों ने इस समय के इसके सौंदर्य पर कितनी ही उत्तम उत्तम कल्पनाएँ की हैं। इसका फूल अत्यंत सुंदर तो होता है पर उसमें गंध नहीं होते। इस विशेषता पर भी बहुत सी उक्तियाँ कही गई हैं।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6
पलाश
होली के लिए रंग बनाने के अलावा इसके फूलों को पीसकर चेहरे में लगाने से चमक बढ़ती है। पलाश की फलियां कृमिनाशक का काम तो करती ही है इसके उपयोग से बुढ़ापा भी दूर रहता है। पलाश फूल से स्नान करने से ताजगी महसूस होती है। पलाश फूल के पानी से स्नान करने से लू नहीं लगती तथा गर्मी का अहसास नहीं होता।
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पलाश
काम शक्तिवर्धक और शीघ्रपतन की समस्या को दूर करता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इससे प्राप्त लकड़ी से दण्ड बनाकर द्विजों का यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6
पलाश
आजकल पलाश का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन बनाने में भी किया जा रहा है। पलाश से प्राप्त कमरकस आयुर्वेदिक औषधि है। पलाश की पत्तियों से पत्रावली भी बनाई जाती है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6
पलाश
किंसुक, पर्ण, याज्ञिक, रक्तपुष्पक, क्षारश्रेष्ठ, वात-पोथ, ब्रह्मावृक्ष, ब्रह्मावृक्षक, ब्रह्मोपनेता, समिद्धर, करक, त्रिपत्रक, ब्रह्मपादप, पलाशक, त्रिपर्ण, रक्तपुष्प, पुतद्रु, काष्ठद्रु, बीजस्नेह, कृमिघ्न, वक्रपुष्पक, सुपर्णी, केसूदो,ब्रह्मकलश।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B2
जीमेल
जीमेल पीसी वर्ल्ड (PC World)''' की " 2005 की 100 सर्वश्रेष्ठ उत्पाद," में मोज़िला फ़ायरफ़ॉक्स के पीछे दूसरे स्थान पर रहा थाजीमेल ने आधारिक पद डिजाइन पुरस्कार 2005 में 'माननीय वर्णन' जीता है।आधारिक पद डिजाइन पुरस्कार माननीय वर्णन है। पुनः प्राप्त 14 फ़रवरी 2007
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B2
जीमेल
जीमेल ने अपने दानशील भंडारण और अनूठे संगठन के लिए अनेक उपयोगकर्ताओं से अनुकूल समिक्षाओ को आकर्षित किया है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B2
जीमेल
19 अक्टूबर 2005 में ब्रिटेन की इंडीपेंडेंट इंटरनेशनल इनवेस्टमेंट रिसर्च नामक कंपनी के साथ विवाद की वजह से गूगल ने स्वेच्छा जीमेल के ब्रिटेन संस्करण को गूगल मेल में परिवर्तित कर दिया।
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जीमेल
जो उपयोगकर्ता गूगल मेल में परिवर्तन के पहले पंजीकृत थे वह अपने जीमेल पते रखने में सक्षम रहे हालांकि जीमेल लोगो को गूगल मेल लोगो में बदल दिया गया। जिन उपयोगकर्ताओं ने परिवर्तन के पश्चात पंजीकरण किया उनको गूगलमेल.कॉम का पता मिला, हालांकि दोनों को ईमेल भेजा जाए तो एक ही जगह पहुँचेगा
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B2
जीमेल
4 जुलाई 2005 को, गूगल ने घोषणा की है कि जीमेल दोइच्लंद का नाम बदलकर वापस गूगल मेल किया जाएगा .उसके पश्चात, जर्मनी से उत्पन्न होने वाले आइपी एड्रेस (IP address) के अभ्यागतों को गूगलमेल.कॉम पर भेजा जाता है जहाँ वह नए डोमेन युक्त ईमेल पते (e-mail address) प्राप्त कर सकते हैं। जिन जर्मन उपयोगकर्ताओं को जीमेल.कॉम के पते चाहिए उनको एक प्रॉक्सी (proxy) द्वारा पंजीकरण करना पड़ता है। जर्मन उपयोगकर्ता जो पहले से ही पंजीकृत हैं उनको अपने पुराने पते रखने की अनुमति दी गई।
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जीमेल
गूगल और डैनियल गिएर्स्च के बीच यह जर्मन नामकरण का मुद्दा एक ट्रेडमार्क विवाद की वजह से है। डैनियल गिएर्स्च "जी मेल" नामक कंपनी का मालिक है जो प्रेषकों के ईमेल को छापकर इच्छित प्राप्तकर्ता को डाक द्वारा भेजने की सेवा प्रदान करता है। 30 जनवरी 2007 को आंतरिक बाजार में संगतिकरण के लिए कार्यालय (Office for Harmonization in the Internal Market) ने गिएर्स्च के पक्ष में निर्णय किया।
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जीमेल
19 जून 2008 के बाद अगर जर्मन आईपी एड्रेस से जीमेल.कॉम डोमेन का अभिगमन किया जाए तो वह गूगल मेल सेवा में पुनर्निर्देश नहीं करताइसके बजाय, एक छोटे पाठ संदेश दिखाया गया है।
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जीमेल
फ़रवरी 2007 में, गूगल ने जीमेल.पीएल, एक नकली कवि समूह के मालिकों, ग्रुपा मॉलओद्य्च आर्टीस्टोव आइ लिटेरातोव'' संक्षिप्त में GMAiL (पूरे में "युवा कलाकारों और लेखकों का समूह "), के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू किया।
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जीमेल
लोद्ज्का गीएलदा कोम्पुतेरोवा (लॉड्ज़ (Łódź) कंप्यूटर बाजार), कंप्यूटर-उपसाधन बेचनेवाले निगम ने प्रचार उद्देश्यों के लिए जीमेल.पीएल नामक डोमेन को पंजीकृत किया था।इस विवाचन अधिकरण ने "प्रक्रियात्मक कारणों के लिए" इस कार्रवाई को रद्द कर दिया.
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साक्षात्कार
उद्योगों में कार्मिक चयन हेतु साक्षात्कार का प्रचलन रहा है। यह एक प्राचीनतम एवं सर्वमान्य विधि के रूप में प्रयुक्त होता आया है। वर्तमान युग में सभी क्षेत्रों में साक्षात्कार को अनिवार्य साधन के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। यह उम्मीदवार तथा उसकी अनुकूलता (Fitness) को जांच-परखने की एक जीवन्त सामाजिक स्थिति है। इसमें दो पक्ष होते हो। इन पक्षों के बीच की वार्ता ही अन्तिम निर्णय का आधार बनती है।
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साक्षात्कार
बिंघम तथा मूर (Bingham & Moore, 1924) ने साक्षात्कार को एक उद्देश्यपूर्ण वार्ता माना है। इन्होंने साक्षात्कार को एक ऐसा चित्र माना जिसके द्वारा साक्षात्कारार्थी को कार्य विशेष के योग्य अथवा अयोग्य घोषित किया जा सकता है। वर्तमान समय में साक्षात्कार के उद्देश्य की भिन्नता को लेकर कई परिवर्तन हुए हैं। भिन्नता के आधार पर साक्षात्कार कभी चयन, कभी मनोवृत्ति, कभी सलाह तो कभी मूल्यांकन आदि हुआ करता है। वाइटेलेस ने साक्षात्कार को आवेदक एवं सेवायोजन पदाधिकारियों के बीच प्रत्यक्ष बातचीत माना है।
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साक्षात्कार
वर्तमान में साक्षात्कार केवल सूचना प्राप्ति का ही साधन नहीं बल्कि मापन का भी प्रधान साधन बन गया है। वर्तमान में व्यावसायिक अनुकूलता (Vocational fitness) ज्ञात करने की एक विधि के रूप में इसके कई उद्देश्य प्रकट हुए हैं
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साक्षात्कार
वर्तमान समय के सन्दर्भ में साक्षात्कार की भूमिका एक शिक्षक तथा साक्षात्कारार्थी के व्यवहार में प्रचलनकर्त्ता एवं वार्तालाप के सुकोमल प्रोत्साहनकर्त्ता के रूप में उभरने लगी है। साक्षात्कार पद्धति से यह लाभ होता है कि आवेदक गलत प्रतिक्रियाएं (Fake responses) सरलता से नहीं दे पाते हो। साक्षात्कार की परिस्थिति यदि सुगठित होती है तो यह एक उत्प्रेरक (Big motivator) का भी काम कर सकती है। सूचना प्राप्ति का यह एकमात्र स्रोत है। साक्षात्कार के समय आवेदक यह संकेत खोजता रहता है कि बातचीत से उस पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और साक्षात्कारकर्त्ता उसके बारे में क्यासोच रहे हो? इन संकेतों द्वारा आवेदक को प्रबलीकरण (Reinforment) मिलता है। उसका हर अगला व्यवहार इसी प्रत्यक्षीकरण से निर्दिष्ट होने लगता है।
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साक्षात्कार
काह्न तथा केंनेल (Kahn and Cannel, 1957) ने साक्षात्कार के अभिप्रेरणात्मक पहलू को विशेष महत्त्व दिया है। इन्होंने साक्षात्कार की सफलता
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साक्षात्कार
यदि साक्षात्कार के दौरान ये शर्तें प्रश्न निर्माण, वास्तविक संचालन, उम्मीदवार के मानसिक स्तर, उसकी तत्परता और भाग लेने की इच्छा आदि विविध स्तरों पर पूरी हो जाती है तो इसके फलस्वरूप दिया गया मापन और निर्णय भी बेजोड़ होगा। एक सफल साक्षात्कारकर्त्ता मृदुभाषी के साथ धैर्यपूर्वक सुनने वाला भी होता है। सारी सूचनाएं साक्षात्कारकर्त्ता से होकर ही गुजरती है। इसलिए साक्षात्कारकर्त्ता का यह धर्म है कि वह काम की सूचनाओं को एकत्र करे, सूचना-संकेतों की तौल करे, उन्हें सही रूप से समन्वित करे और अन्त में आवेदक के चयन के बारे में निर्णय पर पहुंचे। साक्षात्कार की रचना वार्तालाप (Conservation) से ही होती है। इसलिए इसकी सफलता भी दोनों पक्षों की वार्तालापीय कौशल से निर्धारित होगी। किसी अप्रत्याशित घटना के द्वारा कभी-कभी साक्षात्कार के दौरान स्थापित अनुबंध बिगड़ जाये तो ऐसी स्थिति में पुनः नए सिरे से संतुलन खोजने की स्थिति आ जाती है। उद्योगों में साक्षात्कार का चिकित्सात्मक उपयोग भी होने लगा हैं। सभी जगह संरचित साक्षात्कार (Structured interview) का उपयोग किया जाता है।
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साक्षात्कार
वर्तमान में साक्षात्कार के सिद्धान्त और व्यवहार में अपार परिवर्तन हुए हैं। सायमंड्स (Symonds, 1939) ने साक्षात्कार की सफलता हेतु चार कारकों को महत्त्व दिया है-
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साक्षात्कार
विधि की अंतिम सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कर्मचारी संरक्षण (Personnel's protectionory), दूसरों की गोपनीयता के लिए आदर तथा प्राप्त सूचनाओं का सही उपयोग किया जाए तो साक्षात्कार विधि औद्योगिक समस्याओं के अध्ययन हेतु अमूल्य धरोहर सिद्ध हो सकती है।
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साक्षात्कार
साक्षात्कार विधियों में त्रुटियों के कारण इस प्रणाली में पूरा भरोसा करना कठिन है। निरीक्षण से स्पष्ट है कि उम्मीदवारों का मूल्यांकन करने में विभिन्न साक्षात्कारकर्त्ताओं द्वारा प्रचुर भिन्नताएं सामने आती हैं। साक्षात्कार एक सर्वाधिक आत्मनिष्ठ (सब्जेक्टिव) विधि है। चूंकि मूल्यांकनों में सतत अनुरूपता नहीं होती, इसलिए इस विधि को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। जो विधि विश्वसनीय नहीं है, वह सत्य होने का दावा भी नहीं कर सकती है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%BE
ज्वार-भाटा
पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य की पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति की क्रियाशीलता ही ज्वार-भाटा की उत्पत्ति का प्रमुख कारण हैं।
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ज्वार-भाटा
पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य की पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति की क्रियाशीलता ही ज्वार-भाटा की उत्पत्ति का प्रमुख कारण हैं। चन्द्रमा का ज्वार-उत्पादक बल सूर्य की अपेक्षा दोगुना होता है क्युकी यह सूर्य की तुलना में पृथ्वी के अधिक निकट है। अमावस्या और पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा, सूर्य एवं पृथ्वी एक सीध में होते हैं तो उच्च ज्वार उत्पन्न होता है।  दोनों पक्षों की सप्तमी या अष्टमी को सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी के केंद्र पर समकोण बनाते हैं, इस स्थिति में सूर्य और चन्द्रमा के आकर्षण बल एक-दुसरे को संतुलित  करने के प्रयास में प्रभावहीन हो जाते हैं तो निम्न ज्वार उत्पन्न होता है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%BE
ज्वार-भाटा
पृथ्वी पर प्रत्येक स्थान पर प्रतिदिन 12 घंटे 26 मिनट के बाद ज्वार तथा ज्वार के 6 घंटा 13 मिनट बाद भाटा आता है। ज्वार प्रतिदिन दो बार आता है- एक बार चन्द्रमा के आकर्षण से और दूसरी बार पृथ्वी के अपकेन्द्रीय बल के कारण। लेकिन इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर स्थित साउथेम्पटन में ज्वार प्रतिदिन चार बार आते हैं। यहां दो बार ज्वार इंग्लिश चैनल से होकर और दो बार उत्तरी सागर से होकर विभिन्न अंतराल पर पहुंचते हैं।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%BE
ज्वार-भाटा
महासागरीय जल की सतह का औसत दैनिक तापांतर नगण्य होता है। महासागरीय जल का उच्चतम वार्षिक तापक्रम अगस्त में एवम् न्यूनतम वार्षिक तापक्रम फरवरी में अंकित किया जाता है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%BE
ज्वार-भाटा
ज्वार-भाटा की घटना केवल सागर पर ही लागू नहीं होती बल्कि उन सभी चीजों पर लागू होतीं हैं जिन पर समय एवं स्थान के साथ परिवर्तनशील गुरुत्वाकर्षण बल लगता है। इसका अनुभव नदियों, झीलों, तालाबों और अन्य छोटे जल निकायों में नहीं होता है क्युकी बड़े जल क्षेत्र में इसका परिणाम व्यापक होता है। इसलिए महासागर और समुद्र में ज्वारभाटा का अनुभव आसानी से हो जाता है।
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ज्वार-भाटा
प्रत्येक प्राकृतिक घटना मानव जीवन के लिए प्रासंगिक है और जीवित प्राणियों पर अपना प्रभाव डालती है। इसी संदर्भ में ज्वार के महत्व पर नीचे चर्चा की गयी है:
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%BE
ज्वार-भाटा
1. मत्स्य पालन (Fishing): ज्वार समुद्री जीवन जैसे समुद्री पौधों और मछलियों की प्रजनन गतिविधियों को भी प्रभावित करता है।
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ज्वार-भाटा
2. ज्वारपूर्ण खाद्य क्षेत्र (Tidal Zone Foods): ज्वारभाटा की नियमिता के कारण ज्वारीय क्षेत्र के समुद्री जीव जैसे केकड़े, मसल, घोंघे, समुद्री शैवाल आदि की संख्या संतुलित रहती है अगर ज्वारभाटा नियमित ना हो तो इनकी संख्या कम या ये विलुप्त हो सकते हैं।
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ज्वार-भाटा
3. नौ-परिवहण (Navigation): उच्च ज्वार समुद्री यात्राओं में मदद करते हैं। वे समुंद्री किनारों के पानी का स्तर बढ़ा देते हैं जिसकी वजह से जहाज को बंदरगाह पर पहुंचाने में मदद मिलती है।
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उर्वरक
उर्वरक, पौधों के लिये आवश्यक तत्वों की तत्काल पूर्ति के साधन हैं लेकिन इनके प्रयोग के कुछ दुष्परिणाम भी हैं। ये लंबे समय तक मिट्टी में बने नहीं रहते हैं। सिंचाई के बाद जल के साथ ये रसायन जमीन के नीचे भौम जलस्तर तक पहुँचकर उसे दूषित करते हैं। मिट्टी में उपस्थित जीवाणुओं और सुक्ष्मजीवों के लिए भी ये घातक साबित होते हैं। भारत में रासायनिक खाद का सर्वाधिक प्रयोग पंजाब में होता है। वर्तमान समय में वहाँ पानी का जलस्तर एवं मृदा की पोषकता में भारी कमी देखी गई है। इसके साथ ही मृदा तथा उपज में हानीकारक रसायनों की मात्रा में बहुत वृद्दी पाई गई है। इसलिए उर्वरक के विकल्प के रूप में जैविक खाद का प्रयोग तेजी से लोकप्रीय हो रहा है।
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उर्वरक
डी.ए.पी. के कुछ दानों को लेकर तम्बाकू की तरह उसमें चूना मिलाकर मलने पर तीक्ष्ण गन्ध निकलती है, जिसे सूंघना असह्य हो जाता है।
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उर्वरक
यह सख्त दानेदार, भूरा काला बादामी रंगों से युक्त तथा नाखूनों से आसानी से न टूटने वाला उर्वरक है। यह चूर्ण के रूप में भी उपलब्ध होता है। इस दानेदार उर्वरक की मिलावट बहुधा डी.ए.पी. व एन.पी.के. मिक्चर उर्वरकों के साथ की जाने की सम्भावना बनी रहती है।
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उर्वरक
जिंक सल्फेट में मैंग्नीशिम सल्फेट प्रमुख मिलावटी रसायन है। भौतिक रूप से समानता के कारण नकली असली की पहचान कठिन होती है।
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उर्वरक
डी.ए.पी. के घोल में जिंक सल्फेट के घोल को मिलाने पर थक्केदार घना अवक्षेप बन जाता है। मैग्नीशियम सल्फेट के साथ ऐसा नहीं होता।
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उर्वरक
जिंक सल्फेट के घोल में पतला कास्टिक का घोल मिलाने पर सफेद, मटमैला मांड़ जैसा अवक्षेप बनता है, जिसमें गाढ़ा कास्टिक का घोल मिलाने पर अवक्षेप पूर्णतया घुल जाता है। यदि जिंक सल्फेट की जगह पर मैंग्नीशिम सल्फेट है तो अवक्षेप नहीं घुलेगा।
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उर्वरक
(१) तौलिए या थाला में डालना : तौलिए में छोटे पौधों में आधा व बड़े पौधों में एक फुट की तने से दूरी रखते हुए खादें डाल दी जाती है। खादें पौधों की टहनियों के फैलाव के नीचे बिखेर कर डालने के बाद मिट्टी में मिला दी जातीहै। मिट्टी में खादें मिलाना अति आवश्यक होता है। जब बहुत ज्यादा नमी हो या बहुत ज्यादा सूखा पड़ रहा हो तो खादें न डालें।
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उर्वरक
(२) पट्टी में खाद डालना : टहनियों के फैलाव के बाहरी घेरे में 20-25 सेंटीमीटर पट्टी में खादें डाल दी जाती है और ऊपर से ढक दिया जाता है। ऐसे विधि वहीं प्रयोग में लाई जाती है जहां ज्यादा बरसात होती है।
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उर्वरक
(३) छिड़काव विधि : पत्तों के ऊपर छिड़काव किया जाता है। ज्यादात्तर यूरियाखाद को पानी में घोल कर उसे छिड़काव द्वारा पत्तों पर डाला जाता है। 1 किलो यूरिया को ५० लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें पानी कम होने पर पत्तियों के झुलसने की संभावना रहती है
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अफ़ीम
प्रारंभिक खोज से, अफीम का अनुष्ठान महत्त्व प्रतीत होता है, और मानवविज्ञानी ने अनुमान लगाया है कि प्राचीन पुजारियों ने उपचार शक्ति के प्रमाण के रूप में दवा का इस्तेमाल किया होगा। मिस्र में, अफीम का उपयोग आम तौर पर पुजारियों, जादूगरों और योद्धाओं तक ही सीमित था, इसके आविष्कार का श्रेय थॉथ को दिया जाता है, और कहा जाता है कि इसे आइसिस ने रा को सिरदर्द के इलाज के रूप में दिया था। मिनोअन "मादक पदार्थों की देवी" की एक आकृति, तीन अफीम पोपियों का मुकुट पहने हुए, c. 1300 ईसा पूर्व, एक साधारण धूम्रपान उपकरण के साथ, गाज़ी, क्रेते के अभयारण्य से बरामद किया गया था।
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अफ़ीम
ग्रीक देवताओं हिप्नोस (नींद), निक्स (रात), और थानाटोस (मृत्यु) को पोपियों में पुष्पांजलि या उन्हें पकड़े हुए चित्रित किया गया था। पोपियों को अक्सर अपोलो, एस्क्लेपियोस, प्लूटो, डेमेटर, एफ़्रोडाइट, काइबेले और आइसिस की मूर्तियों से सजाया जाता है, जो रात में विस्मृति का प्रतीक है।
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अफ़ीम
जैसे ही रोमन साम्राज्य की शक्ति में गिरावट आई, भूमध्य सागर के दक्षिण और पूर्व की भूमि इस्लामी साम्राज्यों में शामिल हो गई। कुछ मुसलमानों का मानना ​​है कि हदीस, जैसे सही बुखारी में, हर नशीले पदार्थ को प्रतिबंधित करता है, हालांकि विद्वानों द्वारा दवा में नशीले पदार्थों के उपयोग की व्यापक रूप से अनुमति दी गई है। डायोस्कोराइड्स की पांच-खंड डी मटेरिया मेडिका, फार्माकोपियास के अग्रदूत, 1 से 16 वीं शताब्दी तक उपयोग में रहे (जिसे अरबी संस्करणों में संपादित और सुधार किया गया था) और अफीम और इसके व्यापक उपयोग का वर्णन किया गया था। प्राचीन दुनिया।
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अफ़ीम
400 और 1200 ईस्वी के बीच, अरब व्यापारियों ने चीन में और 700 तक भारत में अफीम की शुरुआत की। फ़ारसी मूल के चिकित्सक मुहम्मद इब्न ज़कारिया अल-रज़ी ("रेज़ेज़", 845–930 ईस्वी) ने बगदाद में एक प्रयोगशाला और स्कूल बनाए रखा, और गैलेन के छात्र और आलोचक थे; उन्होंने एनेस्थीसिया में अफीम का उपयोग किया और फी मा-ला-यहदरा अल-ताबीब में उदासी के इलाज के लिए इसके उपयोग की सिफारिश की, "इन द एब्सेंस ऑफ ए फिजिशियन", एक घरेलू चिकित्सा मैनुअल जो आम नागरिकों के लिए स्व-उपचार के लिए निर्देशित है यदि ए डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे।
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अफ़ीम
प्रसिद्ध अंडालूसी ऑप्थल्मोलॉजिक सर्जन अबू अल-कासिम अल-ज़हरवी ("अबुलकासिस", 936-1013 ईस्वी) ने सर्जिकल एनेस्थेटिक्स के रूप में अफीम और मैंड्रेक पर भरोसा किया और एक ग्रंथ, अल-तस्रीफ लिखा, जिसने 16 वीं शताब्दी में चिकित्सा विचार को अच्छी तरह से प्रभावित किया।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A5%80%E0%A4%AE
अफ़ीम
फ़ारसी चिकित्सक अबू 'अली अल-हुसैन इब्न सिना ("एविसेना") ने द कैनन ऑफ मेडिसिन में अफीम को मंड्रेक और अन्य अत्यधिक प्रभावी जड़ी-बूटियों की तुलना में सबसे शक्तिशाली स्टुपेफिएंट्स के रूप में वर्णित किया। पाठ में अफीम के औषधीय प्रभावों को सूचीबद्ध किया गया है, जैसे कि एनाल्जेसिया, सम्मोहन, एंटीट्यूसिव प्रभाव, जठरांत्र संबंधी प्रभाव, संज्ञानात्मक प्रभाव, श्वसन अवसाद, न्यूरोमस्कुलर गड़बड़ी और यौन रोग। यह अफीम की क्षमता को जहर के रूप में भी संदर्भित करता है। एविसेना दवा की खुराक के लिए वितरण और सिफारिशों के कई तरीकों का वर्णन करता है। इस क्लासिक पाठ का 1175 में लैटिन में और बाद में कई अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया था और 19वीं शताब्दी तक आधिकारिक रहा। सेराफेद्दीन सबुनकुओग्लू ने 14वीं सदी के ओटोमन साम्राज्य में माइग्रेन के सिरदर्द, साइटिका और अन्य दर्दनाक बीमारियों के इलाज के लिए अफीम का इस्तेमाल किया।
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अफ़ीम
10वीं और 11वीं शताब्दी के स्यूडो-अपुलीयुस के 5वीं सदी के काम की पांडुलिपियों में नींद को प्रेरित करने और दर्द से राहत के लिए पी. सोम्निफेरम के बजाय जंगली खसखस ​​पापावर एग्रेस्टे या पैपवर रियोस (पी. सिल्वेटिकम के रूप में पहचाने जाने वाले) के उपयोग का उल्लेख है।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A5%80%E0%A4%AE
अफ़ीम
पेरासेलसस के लॉडानम का उपयोग 1527 में पश्चिमी चिकित्सा के लिए पेश किया गया था, जब फिलिपस ऑरियोलस थियोफ्रेस्टस बॉम्बस्टस वॉन होहेनहेम, जिसे पैरासेल्सस के नाम से जाना जाता है, एक प्रसिद्ध तलवार के साथ अरब में अपने भटकने से लौटा, जिसके पोमेल के भीतर उसने "पत्थरों के पत्थर" रखे। अमरता" अफीम थेबैकम, साइट्रस जूस और "सोने की सर्वोत्कृष्टता" से मिश्रित है। "पैरासेलसस" नाम एक छद्म नाम था जो उन्हें औलस कॉर्नेलियस सेल्सस के बराबर या बेहतर दर्शाता था, जिसका पाठ, जिसमें अफीम के उपयोग या इसी तरह की तैयारी का वर्णन किया गया था, का हाल ही में अनुवाद किया गया था और मध्ययुगीन यूरोप में फिर से पेश किया गया था।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A5%80%E0%A4%AE
अफ़ीम
बैसेल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त होने के तीन सप्ताह बाद, मानक चिकित्सा पाठ्यपुस्तक पैरासेलसस को सार्वजनिक अलाव में जला दिया गया, जिसमें अफीम के उपयोग का भी वर्णन किया गया था, हालांकि कई लैटिन अनुवाद खराब गुणवत्ता के थे। लॉडानम ("प्रशंसा के योग्य") मूल रूप से एक विशेष चिकित्सक से जुड़ी दवा के लिए 16 वीं शताब्दी का शब्द था जिसे व्यापक रूप से माना जाता था, लेकिन "अफीम की टिंचर" के रूप में मानकीकृत किया गया, इथेनॉल में अफीम का एक समाधान, जिसे पेरासेलसस ने विकसित करने का श्रेय दिया गया है। अपने जीवनकाल के दौरान, Paracelsus को एक साहसी के रूप में देखा गया, जिसने खतरनाक रासायनिक उपचारों के साथ समकालीन चिकित्सा के सिद्धांतों और भाड़े के उद्देश्यों को चुनौती दी, लेकिन उनके उपचारों ने पश्चिमी चिकित्सा में एक महत्वपूर्ण मोड़ को चिह्नित किया। 1660 के दशक में, थॉमस सिडेनहैम, प्रसिद्ध "अंग्रेजी दवा के पिता" या "अंग्रेजी हिप्पोक्रेट्स" द्वारा दर्द, नींद न आना और दस्त के लिए लॉडेनम की सिफारिश की गई थी, जिसके लिए उद्धरण का श्रेय दिया जाता है, "उन उपचारों में से जो इसे प्रसन्न करते हैं मनुष्य को उसके कष्टों को दूर करने के लिए देने के लिए, कोई भी इतना सार्वभौमिक और इतना प्रभावशाली नहीं है जितना कि अफीम।" इलाज के रूप में अफीम का उपयोग-सब 1728 चैंबर्स साइक्लोपीडिया में वर्णित मिथ्रिडैटियम के निर्माण में परिलक्षित होता था, जिसमें सत्य शामिल था मिश्रण में अफीम।
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अंटार्कटिका
1930 और 1940 के दशक में रिचर्ड एवलिन बायर्ड ने हवाई जहाज से अंटार्कटिक के लिए कई यात्राओं का नेतृत्व किया था। महाद्वीप पर यांत्रिक स्थल परिवहन की शुरुआत का श्रेय भी बायर्ड को ही जाता है, इसके अलावा वो महाद्वीप पर गहन भूवैज्ञानिक और जैविक अनुसंधानों से भी जुड़ा रहा था। 31 अक्टूबर 1956 के दिन रियर एडमिरल जॉर्ज जे डुफेक के नेतृत्व में एक अमेरिकी नौसेना दल ने सफलतापूर्वक एक विमान यहां उतरा था।
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अंटार्कटिका
अंटार्कटिका तक अकेला पहुँचने वाला पहला व्यक्ति न्यूजीलैंड का डेविड हेनरी लुईस था जिसने यहाँ पहुँचने के लिए 10 मीटर लम्बी इस्पात की छोटी नाव आइस बर्ड का प्रयोग किया था।
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अंटार्कटिका
अंटार्कटि‍क में पहला भारतीय अभियान दल जनवरी 1982 में उतरा और तब से भारत ध्रुवीय विज्ञान में अग्रिम मोर्चे पर रहा है। दक्षिण गंगोत्री और मैत्री अनुसंधान केन्द्र स्थित भारतीय अनुसंधान केन्द्र में उपलब्ध मूलभूत आधार में वैज्ञानिकों को विभिन्न वि‍षयों यथा वातावरणीय विज्ञान, जैविक विज्ञान और पर्यावरणीय विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी अनुसंधान करने में सक्षम बनाया। इनमे से कई अनुसंधान कार्यक्रमों में अंटार्कटि‍क अनुसंधान संबंधी वैज्ञानिक समिति (एससीएआर) के तत्वावधान में सीधे वैश्विक परिक्षणों में योगदान किया है।
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अंटार्कटिका
अंटार्कटि‍क वातावरणीय विज्ञान कार्यक्रम में अनेक वैज्ञानिक संगठनों ने भाग लिया। इनमें उल्लेखनीय है भारतीय मौसम विज्ञान, राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला, भारतीय भू-चुम्बकत्व संस्था, कोलकाता विश्वविद्यालय, भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला और बर्कततुल्ला विश्वविद्यालय आदि। इन वैज्ञानिक संगठनों में विशेष रूप से सार्वभौमिक भौतिकी (उपरी वातावरण और भू-चुम्बकत्व) मध्यवर्ती वातावरणीय अध्‍ययन और निम्न वातावरणीय अध्ययन (मौसम, जलवायु और सीमावर्ती परत)। कुल वैश्विक सौर विकीरण और वितरित सौर विकीरण को समझने के लिए विकीरण संतुलन अध्ययन किये जा रहे हैं। इस उपाय से ऊर्जा हस्तांतरण को समझने में सहायता मिलती है जिसके कारण वैश्विक वातावरणीय इंजन आंकड़े संग्रह का काम जारी रख पाता है।
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अंटार्कटिका
मैत्री में नियमित रूप से ओजोन के मापन का काम ओजोनसॉन्‍डे के इस्तेमाल से किया जाता है जो अंटार्कटि‍क पर ओजोन -छिद्र तथ्य और वैश्विक जलवायु परिवर्तन में ओजोन की कमी के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को गति प्रदान करता है। आयनमंडलीय अध्ययन ने एंटार्कटिक वैज्ञानिक प्रयोगों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। 2008-09 अभियान के दौरान कनाडाई अग्रिम अंकीय आयनोसॉन्‍डे (सीएडीआई) नामक अंकीय आयनोसॉन्‍डे स्थापित किया गया। यह हमें अंतरिक्ष की मौसम संबंधी घटनाओं का ब्यौरा देते हैं। मैत्री में वैश्विक आयनमंडलीय चमक और पूर्ण इलैक्ट्रोन अवयव अनुश्रवण प्रणाली (जीआईएसटीएम) स्थापित की गयी है जो पूर्ण इलैक्ट्रोन अवयव (आईटीसीई) और ध्रुवीय आयनमंडलीय चमक और उसकी अंतरिक्ष संबंधी घटनाओं पर निर्भरता के अभिलक्षणों की उपस्थिति की जानकारी देते हैं। जीआईएसटीएम के आंकड़े बृहत और मैसो स्तर के प्लाजामा ढांचे और उसकी गतिविधि को समझने में हमारी सहायता करते हैं। ध्रुवीय क्षेत्र और उसकी सुकमार पर्यावरणीय प्रणाली विभिन्न वैश्विक व्यवस्थाओं के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार की पर्यावरणीय व्यवस्थाएं आंतरिक रूप से स्थिर होती हैं। क्योंकि पर्यावरण में मामूली सा परिवर्तन उन्हें अत्यधिक क्षति पहुंचा सकता है। यह याद है कि ध्रुवीय रचनाओं की विकास दर धीमी है और उसे क्षति से उबरने में अच्छा खासा समय लगता है। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा अंटार्कटि‍क में जैविक अध्ययन समुद्री हिमानी सूक्ष्‍म रचनाओं, सजीव उपजातियों, ताजे पानी और पृथ्‍वी संबंधी पर्यावरणीय प्रणालियों जैव विविधता और अन्य संबद्ध तथ्यों पर विशेष ध्यान देते हैं।
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अंटार्कटिका
क्रायो जैव विज्ञान प्रयोगशाला का 15 फ़रवरी 2010 को उद्घाटन किया गया था ताकि जैव विज्ञान और रसायन विज्ञान के क्षेत्र के उन अनुसंधानकर्ताओं को एक स्थान पर लाया जा सके। जिनकी निम्न तापमान वाली जैव- वैज्ञानिक प्रणालियों के क्षेत्र में एक सामान रूचि हो। इस प्रयोगशाला में इस समय ध्रुवीय निवासियों के जीवाणुओं का अध्ययन किया जा रहा है। जैव वैज्ञानिक कार्यक्रमों की कुछ उपलब्धियों में शीतल आबादियों से बैक्‍टरि‍या की कुछ नई उपजातियों का पता लगाया गया है। अंटार्कटि‍क में अब तक पता लगाई गयी 240 नई उपजातियों में से 30 भारत से हैं। 2008-11 के दौरान ध्रुवीय क्षेत्रों से बैक्‍टरि‍या की 12 नई प्रजातियों का पता चला है। दो जीन का भी पता लगा है जो निम्न तापमान पर बैक्‍टरि‍या को जीवित रखते हैं। जैव प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए कम उपयोगी तापमान पर सक्रिय कई लिपासे और प्रोटीज का भी पता लगाया है।
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अंटार्कटिका
अंटार्कटि‍क संबंधी पर्यावरणी संरक्षण समिति द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार मैत्री में पर्यावरणीय मापदंडों का अनुश्रवण किया जाता है। भारत ने अपने नये अनुसंधान केन्द्रित लार्जेमन्न पहाड़ियों पर पर्यावरणीय पहलुओं पर आधार रेखा आंकड़ें संग्रह संबंधी अध्ययन भी शुरू कर दिये हैं। इसकी प्रमुख उपलब्धियों में पर्यावरणीय मूल्यांकन संबंधी विस्तृत रिपोर्ट की तैयारी है। यह रिपोर्ट लार्जसन्न पर्वतीय क्षेत्र से पर्यावरणीय मानदंडों पर एकत्र किये गये आधार रेखा आंकड़े और पर्यावरणीय प्रयोगशालाओं में किये गये कार्य पर आधारित है। भारत एंटार्कटिक समझौता व्यवस्था की परिधि में दक्षिण गोदावरी हिमनदी के निकट संरक्षित क्षेत्र स्थापित करने में भी सफल रहा।
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अंटार्कटिका
अंटार्कटिका पृथ्वी का सबसे ठंडा स्थान है। पृथ्वी पर सबसे ठंडा प्राकृतिक तापमान कभी २१ जुलाई १९८३ में अंटार्कटिका में रूसी वोस्तोक स्टेशन में -८९.२ डिग्री सेल्सियस (-१२८.६ °F) दर्ज था। अन्टार्कटिका विशाल वीरान बर्फीले रेगिस्तान है। जाड़ो में इसके आतंरिक भागों का कम से कम तापमान −८० °C (−११२ °F) और −९० °C (−१३० °F) के बीच तथा गर्मियों में इनके तटों का अधिकतम तापमान ५ °C (४१ °F) और १५ °C (५९ °F) के बीच होता है। बर्फीली सतह पर गिरने वाली पराबैंगनी प्रकाश की किरणें साधारणतया पूरी तरह से परावर्तित हो जाती है इस कारण अन्टार्कटिका में सनबर्न अक्सर एक स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में है।
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अंटार्कटिका
अंटार्कटिका का पूर्वी भाग, पश्चिमी भाग की अपेक्षा अधिक उंचाई में स्थित होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक ठंडा है। इस दूरस्थ महाद्वीप में मौसम शायद ही कभी प्रवेश करता है इसीलिए इसका केंद्रीय भाग हमेशा ठंडा और शुष्क रहता है। महाद्वीप के मध्य भाग में वर्षा की कमी के बावजूद वहाँ बर्फ बढ़ी हुई समय अवधि के लिए रहती है। महाद्वीप के तटीय भागों में भारी हिमपात सामान्य बात है जहां ४८ घंटे में १.२२ मीटर हिमपात दर्ज किया गया है। यह दक्षिण गोलार्ध में स्थिति बनाये हुए हैं।
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गोरखपुर
यह नगर राप्ती और रोहिणी नामक दो नदियों के तट पर बसा हुआ है। नेपाल से निकलने वाली इन दोनों नदियों में सहायक नदियों का पानी एकत्र हो जाने से कभी-कभी इस क्षेत्र में भयंकर बाढ भी आ जाती है। यहाँ एक बहुत बड़ा तालाब भी है जिसे रामगढ़ ताल कहते हैं। यह बारिश के दिनों में अच्छी खासी झील के रूप में परिवर्तित हो जाता है जिससे आस-पास के गाँवों की खेती के लिये पानी की कमी नहीं रहती।
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गोरखपुर
गोरखपुर महानगर की अर्थव्यवस्था सेवा-उद्योग पर आधारित है। यहाँ का उत्पादन उद्योग पूर्वांचल के लोगों को बेहतर शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सुविधायें, जो गांवों की तुलना में उपलब्ध कराता है जिससे गांवों से शहर की ओर पलायन रुकता है। एक बेहतर भौगोलिक स्थिति और उप शहरी पृष्ठभूमि के लिये शहर की अर्थव्यवस्था सेवा में वृद्धि पर निश्चित रूप से टिकी हुई है।
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गोरखपुर
शहर हाथ से बुने कपडों के लिये प्रसिद्ध है यहाँ का टेराकोटा उद्योग अपने उत्पादों के लिए जाना जाता है। अधिक से अधिक व्यावसायिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों की शाखायें भी हैं। विशेष रूप में आई०सी०आई०सी०आई०, एच०डी०एफ०सी० और आई०डी०बी०आई० बैंक जैसे निजी बैंकों ने इस शहर में अच्छी पैठ बना रखी है।
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गोरखपुर
शहर के भौगोलिक केन्द्र "गोलघर" में कई प्रमुख दुकानों, होटलों, बैंकों और रेस्तराँ के रूप में बलदेव प्लाजा शॉपिंग मॉल शामिल हैं। इसके अतिरिक्त बख्शीपुर में भी कई शॉपिंग माल हैं। यहाँ के "सिटी माल" में 3 स्क्रीन वाला आइनॉक्स मल्टीप्लेक्स भी है जो फिल्म प्रेमियों के लिये एक आकर्षण है। यहाँ एक वाटर पार्क भी है।
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गोरखपुर
गोरखपुर शहर की संस्कृति अपने आप में अद्भुत है। यहाँ परम्परा और संस्कृति का संगम प्रत्येक दिन सुरम्य शहर में देखा जा सकता है। जब आप का दौरा गोरखपुर शहर में हो तो जीवन और गति का सामंजस्य यहाँ आप भली-भाँति देख सकते हैं। सुन्दर और प्रभावशाली लोक परम्पराओं का पालन करने में यहाँ के निवासी नियमित आधार पर अभ्यस्त हैं। यहाँ के लोगों की समृद्ध संस्कृति के साथ लुभावनी दृश्यावली का अवलोकन कर आप मन्त्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते। गोरखपुर की महिलाओं की बुनाई और कढ़ाई, लकड़ी की नक्काशी, दरवाजों और उनके शिल्प-सौन्दर्य, इमारतों के बाहर छज्जों पर छेनी-हथौडे का बारीक कार्य आपका मन मोह लेगा। गोरखपुर में संस्कृति के साथ-साथ यहाँ का जन-जीवन बड़ा शान्त और मेहनती है। देवी-देवताओं की छवियों, पत्थर पर बने बारीक कार्य देखते ही बनते हैं। ब्लॉकों से बनाये गये हर मन्दिर को सजाना यहाँ की एक धार्मिक संस्कृति है। गोरखपुर शहर में स्वादिष्ट भोजन के कई विकल्प हैं। रामपुरी मछली पकाने की परम्परागत सांस्कृतिक पद्धति और अवध के काकोरी कबाब की थाली यहाँ के विशेष व्यंजन हैं।
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गोरखपुर
गोरखपुर संस्कृति का सबसे बड़ा भाग यहाँ के लोक-गीतों और लोक-नृत्यों की परम्परा है। यह परम्परा बहुत ही कलात्मक है और गोरखपुर संस्कृति का ज्वलन्त हिस्सा है। यहाँ के बाशिन्दे गायन और नृत्य के साथ काम-काज के लम्बे दिन का लुत्फ लेते हैं। वे विभिन्न अवसरों पर नृत्य और लोक-गीतों का प्रदर्शन विभिन्न त्योहारों और मौसमों में वर्ष के दौरान करते है। बारहो महीने बरसात और सर्दियों में रात के दौरान आल्हा, कजरी, कहरवा और फाग गाते हैं। गोरखपुर के लोग हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, मृदंग, नगाडा, थाली आदि का संगीत-वाद्ययन्त्रों के रूप में भरपूर उपयोग करते हैं। सबसे लोकप्रिय लोक-नृत्य कुछ त्योहारों व मेलों के विशेष अवसर पर प्रदर्शित किये जाते हैं। विवाह के मौके पर गाने के लिये गोरखपुर की विरासत और परम्परागत नृत्य उनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। गोरखपुर प्रसिद्ध बिरहा गायक बलेसर, भोजपुरी लोकगायक मनोज तिवारी, मालिनी अवस्थी, मैनावती आदि की कर्मभूमि रहा है।
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गोरखपुर
रहस्यवादी कवि और प्रसिद्ध सन्त कबीर (1440-1518) यहीं के थे। उनका मगहर नाम के एक गाँव (गोरखपुर से 20 किमी दूर) देहान्त हुआ। कबीर दास ने अपनी कविताओं के माध्यम से अपने देशवासियों में शान्ति और धार्मिक सद्भाव स्थापित करने की कोशिश की। उनकी मगहर में बनी दफन की जगह तीर्थयात्रियों की एक बड़ी संख्या को अपनी ओर आकर्षित करती है।
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गोरखपुर
मुंशी प्रेमचंद (1880-1936)], भारत के एक महान हिन्दी उपन्यासकार, गोरखपुर में रहते थे। वह घर जहाँ वे रहते थे और उन्होंने अपना साहित्य लिखा उसके समीप अभी भी एक मुंशी प्रेमचंद पार्क उनके नाम पर स्थापित है।
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गोरखपुर
फिराक गोरखपुरी (1896-1982, पूरा नाम : रघुपति सहाय फिराक), प्रसिद्ध उर्दू कवि, गोरखपुर में उनका बचपन का घर अभी भी है। वह बाद में इलाहाबाद में चले गया जहाँ वे लम्बे समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A3%E0%A4%BE
मीणा
इस कानून के तहत चौकीदार मीणा जो चौकीदारी करते थे। यदि उनके क्षेत्र में कहींभी चोरी हो जाय तो चौकीदार मीणा को उसका हर्जाना देना पड़ता था चाहे चोरी कोई भी करे।
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मीणा
मीणा जाति मुख्यतः उत्तर भारत के राज्यो मे स्थित है,मीणा जाति भारत के अलग अलग राज्यों द्वारा अलग अलग श्रेणियों मे सम्मिलित की गयी हैं
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A3%E0%A4%BE
मीणा
मध्य प्रदेश -मीणा जाति मध्य प्रदेश में सिंरोज जिले के विदिशा उपखंड में अनुसूचित जनजाति श्रेणि में सम्मिलित थी जिसे भारत सरकार के गजट नोटिफिकेसन 01-jan-2003 के बाद हटा दिया गया| "वर्तमान में, मीणा(रावत)देशवाली अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित है(आंकडा-प्रवेश संख्या :19)"बाकी सभी 'मीणा' अनारक्षित वर्ग में सम्मिलित है|
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A3%E0%A4%BE
मीणा
जमींदार मीना : जमींदार या पुरानावासी मीणा वे हैं जो प्रायः खेती एवं पशुपालन का कार्य वर्षों से करते आ रहे हैं। ये लोग राजस्थान के सवाईमाधोपुर, करौली,दौसा व जयपुर जिले में सर्वाधिक हैं|
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A3%E0%A4%BE
मीणा
चौकीदार या नयाबासी मीणा : चौकीदार या नयाबासी मीणा वे मीणा हैं जो स्वछंद प्रकृति के थे। इनके पास जमींने नहीं थीं, इस कारण जहां इच्छा हुई वहीं बस गए। उक्त कारणों से इन्हें नयाबासी भी कहा जाता है। ये लोग सीकर, झुंझुनू, एवं जयपुर जिले में सर्वाधिक संख्या में हैं।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A3%E0%A4%BE
मीणा
प्रतिहार या परिहार मीणा : यह अपूर्ण ज्ञान है। प्रतिहार या परिहार एक गोत्र है। इस गोत्र के मीणा टोंक, भीलवाड़ा, तथा बूंदी जिले में बहुतायत में पाये जाते हैं। यह गोत्र अपनी प्रभुत्वता के कारण एक अलग पहचान रखती है । प्रतिहार का शाब्दिक अर्थ उलट का प्रहार करना होता है। ये लोग छापामार युद्ध कौशल में चतुर थे इसलिये प्रतिहार मीना कहलाये।
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https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A3%E0%A4%BE
मीणा
भील मीणा : ये लोग सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं चित्तोड़गढ़ जिले में प्रमुख रूप से निवास करते हैं।
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