Chapter
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61
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76
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890
| Mesra
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2
| Text
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34
|
---|---|---|---|---|
2 | 1 | 26 | 1 |
همی گفت با هر کسی رای خویش
|
2 | 1 | 26 | 2 |
جهان کرد یکسر پر آوای خویش
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2 | 1 | 27 | 1 |
کیومرث زین خود کی آگاه بود
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2 | 1 | 27 | 2 |
که تخت مهی را جز او شاه بود
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2 | 1 | 28 | 1 |
یکایک بیامد خجسته سروش
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2 | 1 | 28 | 2 |
به سان پری پلنگینه پوش
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2 | 1 | 29 | 1 |
بگفتش ورا زین سخن در به در
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2 | 1 | 29 | 2 |
که دشمن چه سازد همی با پدر
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2 | 1 | 30 | 1 |
سخن چون به گوش سیامک رسید
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2 | 1 | 30 | 2 |
ز کردار بدخواه دیو پلید
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2 | 1 | 31 | 1 |
دل شاه بچّه بر آمد به جوش
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2 | 1 | 31 | 2 |
سپاه انجمن کرد و بگشاد گوش
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2 | 1 | 32 | 1 |
بپوشید تن را به چرم پلنگ
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2 | 1 | 32 | 2 |
که جوشن نبود و نه آیین جنگ
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2 | 1 | 33 | 1 |
پذیره شدش دیو را جنگجوی
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2 | 1 | 33 | 2 |
سپه را چو روی اندر آمد به روی
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2 | 1 | 34 | 1 |
سیامک بیامد برهنه تنا
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2 | 1 | 34 | 2 |
بر آویخت با پور آهرمنا
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2 | 1 | 35 | 1 |
بزد چنگ وارونه دیو سیاه
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2 | 1 | 35 | 2 |
دوتا اندر آورد بالای شاه
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2 | 1 | 36 | 1 |
فکند آن تن شاهزاده به خاک
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2 | 1 | 36 | 2 |
به چنگال کردش کمرگاه چاک
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2 | 1 | 37 | 1 |
سیامک به دست خروزان دیو
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2 | 1 | 37 | 2 |
تبه گشت و ماند انجمن بیخدیو
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2 | 1 | 38 | 1 |
چو آگه شد از مرگ فرزند شاه
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2 | 1 | 38 | 2 |
ز تیمار گیتی بر او شد سیاه
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2 | 1 | 39 | 1 |
فرود آمد از تخت ویله کنان
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2 | 1 | 39 | 2 |
زنان بر سر و موی و رخ را کَنان
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2 | 1 | 40 | 1 |
دو رخساره پر خون و دل سوگوار
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2 | 1 | 40 | 2 |
دو دیده پر از نم چو ابر بهار
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2 | 1 | 41 | 1 |
خروشی بر آمد ز لشکر به زار
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2 | 1 | 41 | 2 |
کشیدند صف بر در شهریار
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2 | 1 | 42 | 1 |
همه جامهها کرده پیروزه رنگ
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2 | 1 | 42 | 2 |
دو چشم ابر خونین و رخ بادرنگ
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2 | 1 | 43 | 1 |
دد و مرغ و نخچیر گشته گروه
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2 | 1 | 43 | 2 |
برفتند ویله کنان سوی کوه
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2 | 1 | 44 | 1 |
برفتند با سوگواری و درد
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2 | 1 | 44 | 2 |
ز درگاه کی شاه برخاست گرد
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2 | 1 | 45 | 1 |
نشستند سالی چنین سوگوار
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2 | 1 | 45 | 2 |
پیام آمد از داور کردگار
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2 | 1 | 46 | 1 |
درود آوریدش خجسته سروش
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2 | 1 | 46 | 2 |
کز این بیش مخروش و باز آر هوش
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2 | 1 | 47 | 1 |
سپه ساز و برکش به فرمان من
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2 | 1 | 47 | 2 |
بر آور یکی گرد از آن انجمن
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2 | 1 | 48 | 1 |
از آن بد کنش دیو روی زمین
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2 | 1 | 48 | 2 |
بپرداز و پردخته کن دل ز کین
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2 | 1 | 49 | 1 |
کی نامور سر سوی آسمان
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2 | 1 | 49 | 2 |
بر آورد و بدخواست بر بدگمان
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2 | 1 | 50 | 1 |
بر آن برترین نام یزدانش را
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2 | 1 | 50 | 2 |
بخواند و بپالود مژگانش را
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2 | 1 | 51 | 1 |
و زان پس به کین سیامک شتافت
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2 | 1 | 51 | 2 |
شب و روز آرام و خفتن نیافت
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2 | 2 | 1 | 1 |
خجسته سیامک یکی پور داشت
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2 | 2 | 1 | 2 |
که نزد نیا جاه دستور داشت
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2 | 2 | 2 | 1 |
گرانمایه را نام هوشنگ بود
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2 | 2 | 2 | 2 |
تو گفتی همه هوش و فرهنگ بود
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2 | 2 | 3 | 1 |
به نزد نیا یادگار پدر
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2 | 2 | 3 | 2 |
نیا پروریده مر او را به بر
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2 | 2 | 4 | 1 |
نیایش به جای پسر داشتی
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2 | 2 | 4 | 2 |
جز او بر کسی چشم نگماشتی
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2 | 2 | 5 | 1 |
چو بنهاد دل کینه و جنگ را
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2 | 2 | 5 | 2 |
بخواند آن گرانمایه هوشنگ را
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2 | 2 | 6 | 1 |
همه گفتنیها بدو بازگفت
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2 | 2 | 6 | 2 |
همه رازها بر گشاد از نهفت
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2 | 2 | 7 | 1 |
که من لشکری کرد خواهم همی
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2 | 2 | 7 | 2 |
خروشی برآورد خواهم همی
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2 | 2 | 8 | 1 |
تو را بود باید همی پیشرو
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2 | 2 | 8 | 2 |
که من رفتنیام تو سالار نو
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2 | 2 | 9 | 1 |
پری و پلنگ انجمن کرد و شیر
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2 | 2 | 9 | 2 |
ز درّندگان گرگ و ببر دلیر
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2 | 2 | 10 | 1 |
سپاهی دد و دام و مرغ و پری
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2 | 2 | 10 | 2 |
سپهدار پرکین و کنداوری
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2 | 2 | 11 | 1 |
پس پشت لشکر کیومرث شاه
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2 | 2 | 11 | 2 |
نبیره به پیش اندرون با سپاه
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2 | 2 | 12 | 1 |
بیامد سیه دیو با ترس و باک
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2 | 2 | 12 | 2 |
همی بآسمان بر پراگند خاک
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2 | 2 | 13 | 1 |
ز هرّای درّندگان چنگ دیو
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2 | 2 | 13 | 2 |
شده سست از خشم کیهان خدیو
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2 | 2 | 14 | 1 |
به هم برشکستند هر دو گروه
|
2 | 2 | 14 | 2 |
شدند از دد و دام دیوان ستوه
|
2 | 2 | 15 | 1 |
بیازید هوشنگ چون شیر چنگ
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2 | 2 | 15 | 2 |
جهان کرد بر دیو نستوه تنگ
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2 | 2 | 16 | 1 |
کشیدش سراپای یکسر دوال
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2 | 2 | 16 | 2 |
سپهبد برید آن سر بیهمال
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2 | 2 | 17 | 1 |
به پای اندر افگند و بسپرد خوار
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2 | 2 | 17 | 2 |
دریده بر او چرم و برگشته کار
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2 | 2 | 18 | 1 |
چو آمد مر آن کینه را خواستار
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2 | 2 | 18 | 2 |
سرآمد کیومرث را روزگار
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2 | 2 | 19 | 1 |
برفت و جهان مردری ماند ازوی
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2 | 2 | 19 | 2 |
نگر تا که را نزد او آبروی
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2 | 2 | 20 | 1 |
جهان فریبنده را گرد کرد
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2 | 2 | 20 | 2 |
ره سود بنمود و خود مایه خْوَرد
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2 | 2 | 21 | 1 |
جهان سر به سر چو فسانست و بس
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2 | 2 | 21 | 2 |
نماند بد و نیک بر هیچکس
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3 | 1 | 1 | 1 |
جهاندار هوشنگ با رای و داد
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3 | 1 | 1 | 2 |
به جای نیا تاج بر سر نهاد
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3 | 1 | 2 | 1 |
بگشت از برش چرخ سالی چهل
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3 | 1 | 2 | 2 |
پر از هوش مغز و پر از رای دل
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3 | 1 | 3 | 1 |
چو بنشست بر جایگاه مهی
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3 | 1 | 3 | 2 |
چنین گفت بر تخت شاهنشهی
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Subsets and Splits
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