Chapter
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61
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76
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2
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34
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---|---|---|---|---|
1 | 10 | 5 | 1 |
و دیگر که گنجم وفادار نیست
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1 | 10 | 5 | 2 |
همین رنج را کس خریدار نیست
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1 | 10 | 6 | 1 |
بر این گونه یک چند بگذاشتم
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1 | 10 | 6 | 2 |
سخن را نهفته همی داشتم
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1 | 10 | 7 | 1 |
سراسر زمانه پر از جنگ بود
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1 | 10 | 7 | 2 |
به جویندگان بر جهان تنگ بود
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1 | 10 | 8 | 1 |
ز نیکو سخن بهْ چه اندر جهان
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1 | 10 | 8 | 2 |
به نزد سخن سنج فرّخ مهان
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1 | 10 | 9 | 1 |
اگر نامدی این سخن از خدای
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1 | 10 | 9 | 2 |
نبی کِی بدی نزد ما رهنمای
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1 | 10 | 10 | 1 |
به شهرم یکی مهربان دوست بود
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1 | 10 | 10 | 2 |
تو گفتی که با من به یک پوست بود
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1 | 10 | 11 | 1 |
مرا گفت خوب آمد این رای تو
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1 | 10 | 11 | 2 |
به نیکی گراید همی پای تو
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1 | 10 | 12 | 1 |
نبشته من این نامهٔ پهلوی
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1 | 10 | 12 | 2 |
به پیش تو آرم مگر نغنوی
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1 | 10 | 13 | 1 |
گشاده زبان و جوانیت هست
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1 | 10 | 13 | 2 |
سخن گفتن پهلوانیت هست
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1 | 10 | 14 | 1 |
شو این نامهٔ خسروان باز گوی
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1 | 10 | 14 | 2 |
بدین جوی نزد مهان آبروی
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1 | 10 | 15 | 1 |
چو آورد این نامه نزدیک من
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1 | 10 | 15 | 2 |
بر افروخت این جان تاریک من
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1 | 11 | 1 | 1 |
بدین نامه چون دست کردم دراز
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1 | 11 | 1 | 2 |
یکی مهتری بود گردنفراز
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1 | 11 | 2 | 1 |
جوان بود و از گوهر پهلوان
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1 | 11 | 2 | 2 |
خردمند و بیدار و روشن روان
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1 | 11 | 3 | 1 |
خداوند رای و خداوند شرم
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1 | 11 | 3 | 2 |
سخن گفتن خوب و آوای نرم
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1 | 11 | 4 | 1 |
مرا گفت کز من چه باید همی
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1 | 11 | 4 | 2 |
که جانت سخن برگراید همی
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1 | 11 | 5 | 1 |
به چیزی که باشد مرا دسترس
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1 | 11 | 5 | 2 |
بکوشم نیازت نیارم به کس
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1 | 11 | 6 | 1 |
همی داشتم چون یکی تازه سیب
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1 | 11 | 6 | 2 |
که از باد نامد به من بر نهیب
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1 | 11 | 7 | 1 |
به کیوان رسیدم ز خاک نژند
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1 | 11 | 7 | 2 |
از آن نیکدل نامدار ارجمند
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1 | 11 | 8 | 1 |
به چشمش همان خاک و هم سیم و زر
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1 | 11 | 8 | 2 |
کریمی بدو یافته زیب و فر
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1 | 11 | 9 | 1 |
سراسر جهان پیش او خوار بود
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1 | 11 | 9 | 2 |
جوانمرد بود و وفادار بود
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1 | 11 | 10 | 1 |
چنان نامور گم شد از انجمن
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1 | 11 | 10 | 2 |
چو در باغ سرو سهی از چمن
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1 | 11 | 11 | 1 |
نه ز او زنده بینم نه مرده نشان
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1 | 11 | 11 | 2 |
به دست نهنگان مردم کشان
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1 | 11 | 12 | 1 |
دریغ آن کمربند و آن گِردگاه
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1 | 11 | 12 | 2 |
دریغ آن کِیی برز و بالای شاه
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1 | 11 | 13 | 1 |
گرفتار ز او دل شده ناامید
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1 | 11 | 13 | 2 |
نوان لرز لرزان به کردار بید
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1 | 11 | 14 | 1 |
یکی پند آن شاه یاد آوریم
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1 | 11 | 14 | 2 |
ز کژی روان سوی داد آوریم
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1 | 11 | 15 | 1 |
مرا گفت کاین نامهٔ شهریار
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1 | 11 | 15 | 2 |
گرت گفته آید به شاهان سپار
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1 | 11 | 16 | 1 |
بدین نامه من دست بردم فراز
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1 | 11 | 16 | 2 |
به نام شهنشاه گردنفراز
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1 | 12 | 1 | 1 |
جهان آفرین تا جهان آفرید
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1 | 12 | 1 | 2 |
چون او مرزبانی نیامد پدید
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1 | 12 | 2 | 1 |
چو خورشید بر چرخ بنمود تاج
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1 | 12 | 2 | 2 |
زمین شد به کردار تابنده عاج
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1 | 12 | 3 | 1 |
چه گویم که خورشید تابان که بود
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1 | 12 | 3 | 2 |
کز او در جهان روشنایی فزود
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1 | 12 | 4 | 1 |
ابوالقاسم آن شاه پیروز بخت
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1 | 12 | 4 | 2 |
نهاد از بر تاج خورشید تخت
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1 | 12 | 5 | 1 |
ز خاور بیاراست تا باختر
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1 | 12 | 5 | 2 |
پدید آمد از فرّ او کان زر
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1 | 12 | 6 | 1 |
مرا اختر خفته بیدار گشت
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1 | 12 | 6 | 2 |
به مغز اندر اندیشه بسیار گشت
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1 | 12 | 7 | 1 |
بدانستم آمد زمان سخن
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1 | 12 | 7 | 2 |
کنون نو شود روزگار کهن
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1 | 12 | 8 | 1 |
بر اندیشهٔ شهریار زمین
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1 | 12 | 8 | 2 |
بخفتم شبی لب پر از آفرین
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1 | 12 | 9 | 1 |
دل من چو نور اندر آن تیره شب
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1 | 12 | 9 | 2 |
نخفته گشاده دل و بسته لب
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1 | 12 | 10 | 1 |
چنان دید روشن روانم به خواب
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1 | 12 | 10 | 2 |
که رخشنده شمعی بر آمد ز آب
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1 | 12 | 11 | 1 |
همه روی گیتی شب لاژورد
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1 | 12 | 11 | 2 |
از آن شمع گشتی چو یاقوت زرد
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1 | 12 | 12 | 1 |
در و دشت بر سان دیبا شدی
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1 | 12 | 12 | 2 |
یکی تخت پیروزه پیدا شدی
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1 | 12 | 13 | 1 |
نشسته بر او شهریاری چو ماه
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1 | 12 | 13 | 2 |
یکی تاج بر سر به جای کلاه
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1 | 12 | 14 | 1 |
رده بر کشیده سپاهش دو میل
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1 | 12 | 14 | 2 |
به دست چپش هفتصد ژنده پیل
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1 | 12 | 15 | 1 |
یکی پاک دستور پیشش به پای
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1 | 12 | 15 | 2 |
بداد و بدین شاه را رهنمای
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1 | 12 | 16 | 1 |
مرا خیره گشتی سر از فرّ شاه
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1 | 12 | 16 | 2 |
و زان ژنده پیلان و چندان سپاه
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1 | 12 | 17 | 1 |
چو آن چهرهٔ خسروی دیدمی
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1 | 12 | 17 | 2 |
از آن نامداران بپرسیدمی
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1 | 12 | 18 | 1 |
که این چرخ و ماه است یا تاج و گاه
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1 | 12 | 18 | 2 |
ستاره است پیش اندرش یا سپاه
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1 | 12 | 19 | 1 |
یکی گفت کاین شاه روم است و هند
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1 | 12 | 19 | 2 |
ز قنّوج تا پیش دریای سند
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1 | 12 | 20 | 1 |
به ایران و توران ورا بندهاند
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1 | 12 | 20 | 2 |
به رای و به فرمان او زندهاند
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1 | 12 | 21 | 1 |
بیاراست روی زمین را به داد
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1 | 12 | 21 | 2 |
بپردخت از آن تاج بر سر نهاد
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1 | 12 | 22 | 1 |
جهاندار محمود شاه بزرگ
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1 | 12 | 22 | 2 |
به آبشخور آرد همی میش و گرگ
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1 | 12 | 23 | 1 |
ز کشمیر تا پیش دریای چین
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1 | 12 | 23 | 2 |
بر او شهریاران کنند آفرین
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Subsets and Splits
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