Chapter
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61
| Part
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76
| Bait
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890
| Mesra
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2
| Text
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34
|
---|---|---|---|---|
1 | 7 | 14 | 1 |
حکیم این جهان را چو دریا نهاد
|
1 | 7 | 14 | 2 |
بر انگیخته موج از او تندباد
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1 | 7 | 15 | 1 |
چو هفتاد کشتی بر او ساخته
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1 | 7 | 15 | 2 |
همه بادبانها بر افراخته
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1 | 7 | 16 | 1 |
یکی پهن کشتی به سان عروس
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1 | 7 | 16 | 2 |
بیاراسته همچو چشم خروس
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1 | 7 | 17 | 1 |
محّمد بدو اندرون با علی
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1 | 7 | 17 | 2 |
همان اهل بیت نبی و ولی
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1 | 7 | 18 | 1 |
خردمند کز دور دریا بدید
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1 | 7 | 18 | 2 |
کرانه نه پیدا و بن ناپدید
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1 | 7 | 19 | 1 |
بدانست کو موج خواهد زدن
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1 | 7 | 19 | 2 |
کس از غرق بیرون نخواهد شدن
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1 | 7 | 20 | 1 |
به دل گفت اگر با نبی و وصی
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1 | 7 | 20 | 2 |
شوم غرقه دارم دو یار وفی
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1 | 7 | 21 | 1 |
همانا که باشد مرا دستگیر
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1 | 7 | 21 | 2 |
خداوند تاج و لوا و سریر
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1 | 7 | 22 | 1 |
خداوند جوی می و انگبین
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1 | 7 | 22 | 2 |
همان چشمهٔ شیر و ماء معین
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1 | 7 | 23 | 1 |
اگر چشم داری به دیگر سرای
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1 | 7 | 23 | 2 |
به نزد نبی و علی گیر جای
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1 | 7 | 24 | 1 |
گرت زین بد آید گناه من است
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1 | 7 | 24 | 2 |
چنین است و این دین و راه من است
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1 | 7 | 25 | 1 |
بر این زادم و هم بر این بگذرم
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1 | 7 | 25 | 2 |
چنان دان که خاک پی حیدرم
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1 | 7 | 26 | 1 |
دلت گر به راه خطا مایل است
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1 | 7 | 26 | 2 |
تو را دشمن اندر جهان خود دل است
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1 | 7 | 27 | 1 |
نباشد جز از بیپدر دشمنش
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1 | 7 | 27 | 2 |
که یزدان به آتش بسوزد تنش
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1 | 7 | 28 | 1 |
هر آنکس که در جانش بغض علی است
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1 | 7 | 28 | 2 |
از او زارتر در جهان زار کی است
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1 | 7 | 29 | 1 |
نگر تا نداری به بازی جهان
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1 | 7 | 29 | 2 |
نه برگردی از نیک پی همرهان
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1 | 7 | 30 | 1 |
همه نیکیات باید آغاز کرد
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1 | 7 | 30 | 2 |
چو با نیکنامان بوی همنورد
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1 | 7 | 31 | 1 |
از این در سخن چند رانم همی
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1 | 7 | 31 | 2 |
همانا کرانش ندانم همی
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1 | 8 | 1 | 1 |
سخن هر چه گویم همه گفتهاند
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1 | 8 | 1 | 2 |
بر باغ دانش همه رفتهاند
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1 | 8 | 2 | 1 |
اگر بر درخت برومند جای
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1 | 8 | 2 | 2 |
نیابم که از بر شدن نیست رای
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1 | 8 | 3 | 1 |
کسی کو شود زیر نخل بلند
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1 | 8 | 3 | 2 |
همان سایه ز او بازدارد گزند
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1 | 8 | 4 | 1 |
توانم مگر پایهای ساختن
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1 | 8 | 4 | 2 |
بر شاخ آن سرو سایه فکن
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1 | 8 | 5 | 1 |
کز این نامور نامهٔ شهریار
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1 | 8 | 5 | 2 |
به گیتی بمانم یکی یادگار
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1 | 8 | 6 | 1 |
تو این را دروغ و فسانه مدان
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1 | 8 | 6 | 2 |
به رنگ فسون و بهانه مدان
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1 | 8 | 7 | 1 |
از او هر چه اندر خورد با خرد
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1 | 8 | 7 | 2 |
دگر بر ره رمز و معنی برد
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1 | 8 | 8 | 1 |
یکی نامه بود از گه باستان
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1 | 8 | 8 | 2 |
فراوان بدو اندرون داستان
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1 | 8 | 9 | 1 |
پراگنده در دست هر موبدی
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1 | 8 | 9 | 2 |
از او بهرهای نزد هر بخردی
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1 | 8 | 10 | 1 |
یکی پهلوان بود دهقان نژاد
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1 | 8 | 10 | 2 |
دلیر و بزرگ و خردمند و راد
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1 | 8 | 11 | 1 |
پژوهندهٔ روزگار نخست
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1 | 8 | 11 | 2 |
گذشته سخنها همه باز جست
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1 | 8 | 12 | 1 |
ز هر کشوری موبدی سالخَورد
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1 | 8 | 12 | 2 |
بیاورد کاین نامه را یاد کرد
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1 | 8 | 13 | 1 |
بپرسیدشان از کیان جهان
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1 | 8 | 13 | 2 |
و زان نامداران فرخ مهان
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1 | 8 | 14 | 1 |
که گیتی به آغاز چون داشتند
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1 | 8 | 14 | 2 |
که ایدون به ما خوار بگذاشتند
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1 | 8 | 15 | 1 |
چه گونه سر آمد به نیک اختری
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1 | 8 | 15 | 2 |
بر ایشان همه روز گُند آوری
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1 | 8 | 16 | 1 |
بگفتند پیشش یکایک مهان
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1 | 8 | 16 | 2 |
سخنهای شاهان و گشت جهان
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1 | 8 | 17 | 1 |
چو بشنید از ایشان سپهبد سخن
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1 | 8 | 17 | 2 |
یکی نامور نامه افکند بن
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1 | 8 | 18 | 1 |
چنین یادگاری شد اندر جهان
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1 | 8 | 18 | 2 |
بر او آفرین از کهان و مهان
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1 | 9 | 1 | 1 |
چو از دفتر این داستانها بسی
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1 | 9 | 1 | 2 |
همی خواند خواننده بر هر کسی
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1 | 9 | 2 | 1 |
جهان دل نهاده بدین داستان
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1 | 9 | 2 | 2 |
همان بخردان نیز و هم راستان
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1 | 9 | 3 | 1 |
جوانی بیامد گشاده زبان
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1 | 9 | 3 | 2 |
سخن گفتن خوب و طبع روان
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1 | 9 | 4 | 1 |
به شعر آرم این نامه را گفت من
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1 | 9 | 4 | 2 |
از او شادمان شد دل انجمن
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1 | 9 | 5 | 1 |
جوانیش را خوی بد یار بود
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1 | 9 | 5 | 2 |
ابا بد همیشه به پیکار بود
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1 | 9 | 6 | 1 |
بر او تاختن کرد ناگاه مرگ
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1 | 9 | 6 | 2 |
نهادش به سر بر یکی تیره ترگ
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1 | 9 | 7 | 1 |
بدان خوی بد جان شیرین بداد
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1 | 9 | 7 | 2 |
نبد از جوانیش یک روز شاد
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1 | 9 | 8 | 1 |
یکایک از او بخت برگشته شد
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1 | 9 | 8 | 2 |
به دست یکی بنده بر کشته شد
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1 | 9 | 9 | 1 |
برفت او و این نامه ناگفته ماند
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1 | 9 | 9 | 2 |
چنان بخت بیدار او خفته ماند
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1 | 9 | 10 | 1 |
الهی عفو کن گناه ورا
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1 | 9 | 10 | 2 |
بیفزای در حشر جاه ورا
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1 | 10 | 1 | 1 |
دل روشن من چو برگشت از اوی
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1 | 10 | 1 | 2 |
سوی تخت شاه جهان کرد روی
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1 | 10 | 2 | 1 |
که این نامه را دست پیش آورم
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1 | 10 | 2 | 2 |
ز دفتر به گفتار خویش آورم
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1 | 10 | 3 | 1 |
بپرسیدم از هر کسی بیشمار
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1 | 10 | 3 | 2 |
بترسیدم از گردش روزگار
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1 | 10 | 4 | 1 |
مگر خود درنگم نباشد بسی
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1 | 10 | 4 | 2 |
بباید سپردن به دیگر کسی
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Subsets and Splits
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